भारतकोश
वेदान्तसार (नृसिंहसरस्वती टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्तसार (नृसिंहसरस्वती टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara by Sadananda Yogindra

सदानन्द योगीन्द्र द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished145 पृष्ठ

पृष्ठ 67, कुल 145 में से

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संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेत । ( ६७ ) देते हैं-“मनोमय अन्तरात्मा शरीर, इन्द्रिय और प्राण इनसे भिन्न है” इसकारण मनही आत्मा है । और अपने मतकी प्राधान्यता और रक्षाके अर्थ यह युक्ति देते हैं-“जिस समय मन स्वभावस्था में होता है तब प्राणादिका अभाव होता है । और मुझको यह संकल्प है और यह विकल्प है इसप्रकार अ- भवभी सबहीको होता है”इसकारण मनही आत्मा है॥ ६४ ॥ बौद्धस्तु “अन्योऽन्तर आत्मा विज्ञानमयः” इत्यादिश्रुतेः कर्तुरभावे करणस्य शक्त्य- भावात् ‘अहं कर्त्ता अहं भोक्ता’ इत्याद्यनु- भवाच्च बुद्धिरात्मेति वदति ॥ ६५ ॥ ( सं० टी० ) उक्तेभ्यः पंचभ्यो विलक्षणः कश्चिद्विज्ञान- वादी श्रुत्यादिभिर्विज्ञानमात्मेत्याह । बौद्धस्त्विति ॥ ६५ ॥ ( भा०टी० ) बौद्धमतावलम्बी बुद्धिको आत्मा कहते हैं और इस श्रुतिका प्रमाण देते हैं-“विज्ञानमय अन्तरात्मा शरीर, प्राण और मन इनसे भिन्न है” और यह युक्ति देते हैं- “जिस समय कर्त्ताका अभाव होता है तबही करणकी श- क्तिका अभाव होता है । ऐसी प्रतीति है और बुद्धिके अभाव होनेपर इन्द्रियोंकी शक्तिका अभाव देखनेमें आता है । और ‘मैं कर्त्ता हूँ मैं भोक्ता हूँ’इसप्रकार अनुभवभी आपामर पण्डित साधारण सबहीको होता है इसकारण बुद्धिहीको आ- त्मत्वसिद्ध होता है” ॥ ६५ ॥ प्राभाकरतार्किकौ तु “अन्योऽन्तर आत्मा