भारतकोश
वेदान्तसार (नृसिंहसरस्वती टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्तसार (नृसिंहसरस्वती टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara by Sadananda Yogindra

सदानन्द योगीन्द्र द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished145 पृष्ठ

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( ९० ) वेदान्तसार । राकरणप्रकारमेवाह । तत्रेति । तथा च गंगायां घोष इत्यत्र श्रुतवाक्यार्थस्य गंगाघोषयोराधाराधेयभावसंबंधस्य विरोधे स ति श्रूयमाणं गंगापदं स्वार्थपरित्यागेन तीरपदार्थं लक्षयतीति युक्तं गंगापदार्थस्य तीरपदार्थप्रतीतिसापेक्षत्वादिहेतुश्रूयमाण- तत्त्वंपदयोर्मुख्यतयैव तदर्थसर्वज्ञत्वकिंचित्ज्ञत्वादिविशिष्टप्र- तीतौ सत्यामपि लक्षणया तत्पदेन त्वंपदार्थप्रतीत्यपेक्षाभा- वात्त्वंपदेन तत्पदार्थप्रतीत्यपेक्षाभावाच्च मुख्यार्थे संभवति ल- क्षणाया अन्याय्यत्वाज्जहल्लक्षणा न संभवतीत्यर्थः ॥ ८१ ॥ ( भा०टी० ) जैसे गङ्गापदका वाच्यार्थ परित्यागकरके लक्षणाद्वारा तीर अर्थ ग्रहण किया जाताहै तिसी प्रकार ल- क्षणाद्वारा तत्पदका वाच्यार्थ परित्याग करके त्वं पदार्थ- में अथवा त्वंपदका शक्यार्थ परित्याग करके तत्पदार्थ- में लक्षित होजाय । तब तौ “तत्त्वमसि” वाक्यमें भी जह- त्स्वार्थ लक्षणा सङ्गत होजायगी । सो ठीक नहींहै क्योंकि “गङ्गायां घोषः” इस वाक्यमें तीरशब्दका उच्चारण नहींहै इसकारण तीर अर्थ की अपेक्षा करके जहत्स्वार्थलक्षणा स- ङ्गत होती है। परन्तु “तत्त्वमसि” इस वाक्यमें “तत्” और “त्वम्” यह दोनों पदार्थ युक्त हैं और दोनोंके अर्थ प्रसिद्ध हैं इस कारण यहां लक्षणाद्वारा अन्य पदको अन्यतर अर्थ- की आवश्यकता नहीं है इस कारण “तत्त्वमसि” वाक्यमें जहत्स्वार्थलक्षणा असङ्गत होती है कारण कि, जो कोई वाक्य सुना जाताहै, उस वाक्यका मुख्य अर्थ समझनेमें वि-

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