वेदान्तसार (नृसिंहसरस्वती टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedantasara by Sadananda Yogindra
सदानन्द योगीन्द्र द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 93, कुल 145 में से
संदर्भ में पढ़ेंसंस्कृतटीका-भाषाटीकासमेत । ( ९३ ) तौ लक्षण्या पुनरन्यतरपदार्थप्रतीत्यपेक्षाभा- वाच्च ॥ ८३ ॥ ( सं०टी० ) ननु तत्पदं स्वार्थं विरुद्धपरोक्षत्वादिधर्मं परित्यज्याविरुद्धचैतन्यांशापरित्यागेन त्वंपदार्थं किंचिज्ज्ञ- त्वादिविशिष्टं जीवचैतन्यं लक्षयतु त्वंपदं वा स्वार्थविरुद्धापरो- क्षत्वादिधर्मं परित्यज्याविरुद्धचैतन्यांशापरित्यागेन तत्पदार्थं सर्वज्ञत्वादिविशिष्टमीश्वरचैतन्यं लक्षयतु किं भागलक्षणांगी- कारेणेत्याशंक्य निराकरोति । नचेति । एकेन तत्पदेन त्वंपदेन वा स्वार्थांशपरित्यागपदार्थांतरस्वीकारोभयलक्षणा- संभवादित्यर्थः । अजहल्लक्षणासंभवे हेत्वंतरमाह । पदांतरेणे- ति।तत्पदेन त्वंपदेन वा तत्तदर्थप्रतीतौ सत्यां लक्षण्या पुनर- न्यतरस्यान्यतरप्रतीत्यपेक्षाभावादित्यर्थः । अतः परि- शेषात् ॥ ८३ ॥ ( भा०टी० ) और यह भी नहीं कहसक्ते कि “तत्” वा “त्वम्” पदार्थका स्वस्वविरुद्ध अर्थांश परित्याग करके अ- विरुद्ध अर्थके सहित “तत्” वा “त्वम्” पदका अर्थ लक्षित होकर भागलक्षणा का स्वीकार करता भी निष्फल है । क्योंकि एक पदके द्वारा स्वीय अविरुद्ध अंशका परित्याग और अन्य पदार्थ इन दोनों अर्थका लक्षणासे होना असम्भ- वहै । तथा अन्य पदद्वारा जो अर्थ प्रतीत होता है लक्षणा- द्वारा । दूसराके उससे अन्य पदार्थ का बोध नहीं होसक्ता ८३