वेणीसंहारम् (भट्ट नारायण - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)
Venisamhara Nataka of Bhatta Narayana with Commentary
भट्ट नारायण द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकथा-सार १३ भाइयोंके साथ कौरवनरेश दुर्योधनको धिक्कार है, जिसका आजतक कोई शत्रु नहीं उस अजातशत्रु धर्मराज युधिष्ठिरको धिक्कार है और जिन्होंने चित्र बनकर उस समय द्रौपदीके केशाकर्षणको तथा आज विश्ववन्द्य गुरु द्रोणाचार्यके केशाकर्षणको देखा उन्हें भी धिक्कार है। अर्थात् मुझे भी धिक्कार है।' ऐसा कहकर वे अश्वत्थामाको सेनापति बनाकर पाण्डवोंसे बदला लेनेके लिये उत्साहित करके दुर्योधनके पास ले गये। परन्तु इनके जानेके पहले ही महारथी कर्ण अपना रंग जमाकर सेनापतिके पदपर आरूढ हो चुके थे, अतः अश्वत्थामाके सेनापति बननेकी पदलोलुपताको देखकर व्यंग्यभरे शब्दोंमें कर्णने कहा—'द्रौणायने ! सेनापति बनना सहज नहीं। अभी-अभी आपके भुजपराक्रमशाली पूज्य पिताने सेनापति बनकर ही तो धृष्टद्युम्नसे त्रस्त होकर रणमें शस्त्र त्यागकर अपने साथ महारथियोंको भी मौतके घाट उतरवाया है। आखिर आप भी तो उन्हींके पुत्र हैं न !' इस तरह कर्णकी विविध प्रकारसे व्यंग्यभरी बातों को सुनकर अश्वत्थामा जल उठे और धैर्यच्युत होकर कहने लगे—अरे रे, राधागर्भभारभूत ! शस्त्रानभिज्ञ !! मेरे पिताकी निन्दा कर रहा है ! अरे, सूताधम ! मेरे पिता के भुजबलसे समस्त संसार विदित है। जब तक वे जीते रहे समरभूमिमें पाण्डवों के ऊपर क्या- क्या उत्पात मचाया, क्या तूने नहीं देखा था ? चापलूस ! उन्होंने रणसे शस्त्र का त्याग क्यों किया था इसका उत्तर सत्यपरायण धर्मराज युधिष्ठिरसे पूछ ! अरे समरभूमि से भागकर आनेवाले कायर ! भीरु !! समरमें उस समय तू कहाँ था ? कहाँ चली गयी थी तेरी यह वीरता ? अरे, व्यर्थाभिमानी ! मेरे पिताने पुत्रशोक या धृष्टद्युम्नसे त्रस्त होकर रणमें शस्त्रत्याग कर दिया, किन्तु व्यर्थ भुजाओंके अभिमानसे फूले न समाये तेरे मस्तक को अभी मैं केवल वाम (लघु) पादप्रहारसे चूर्णकर देता हूँ, ले, सम्भल जा मूर्ख ! बस, क्या था। अश्वत्थामाके पादप्रहारसे, बचकर कर्ण भी तलवार खींचकर खड़े हो गये और कहने लगे—अरे वकवादी ! ब्राह्मणाधम !! ब्राह्मण होनेके कारण तू अवध्य है, नहीं तो अभी तेरी गर्दनको धड़से अलग कर देता। इतना सुनते ही अश्वत्थामाने कड़ाकेसे अपने यज्ञोपवीतको तोड़ डाला और कहा—ले ! यदि मैं ब्राह्मण होनेके कारण ही तेरा अवध्य हूँ तो इस जातिको आज मैंने छोड़ दिया। अब आगे बढ़। अभी तुझे मारकर मैं अर्जुनकी प्रतिज्ञाको भग्न करता