वेणीसंहारम् (भट्ट नारायण - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)
Venisamhara Nataka of Bhatta Narayana with Commentary
भट्ट नारायण द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६ कथा-सार बिलख कर रो रहे थे। सुन्दरकको सामने देख बड़ी उत्सुकतासे युद्धका समाचार पूछने लगे। सुन्दरकने कुमार वृषसेन और गाण्डीवधारी अर्जुनके विकट संग्रामका सविस्तार वर्णन करते हुए अन्तमें कुमारकी दुःखद मृत्युका समाचार भी सुना दिया। राजा दुर्योधन 'हाय 'वत्स वृषसेन !' कहकर रोने लगे। इसी समय वहाँ गान्धारीके साथ महाराज धृतराष्ट्रके आनेका समाचार पहुँच गया। दुर्योधन लज्जित होकर अपना काला मुँह छिपानेका प्रयत्न करने लगे। पञ्चम अङ्क माता गान्धारीने कहा-पुत्र ! सर्वनाश हो चुका, तुझे मेरी शपथ है, अब भी युद्धविमुख हो जा (मुझे निपुत्री होनेसे बचा)। अब एकमात्र तू ही हम दोनों अन्धोंका पथ-प्रदर्शक बच गया है। इसी प्रकार पिता धृतराष्ट्र भी कहने लगे—देखो बेटा ! जिस भीष्मपितामह और द्रोणाचार्यके बलपर हम नहीं प्रत्युत सारा विश्व तेरी विजयपर निःशङ्क था, वे दोनों तो प्रथम ही मार डाले गये। आज महाप्रतापी कर्णके सामने उसके ही पुत्र वीर वृषसेनकी हत्याके समय अर्जुनके गांडीवकी टङ्कारोंसे संसार कम्पित हो उठा है। पुत्र ! पाण्डवोंकी सभी प्रतिज्ञायें पूरी होती जा रही हैं। अतः शत्रुविषयक अभिमान परित्याग कर समय रहते अब भी तुम युधिष्ठिराभिलषित संधिनियमसे (सिर्फ पाँच गाँव देकर) सन्धि कर लो। युधिष्ठिर अभी भी सन्धि करनेका इच्छुक है क्योंकि उसकी प्रतिज्ञा है कि—'मेरे भाइयोंमें एकका भी वध होगा तो मैं जीवित नहीं रहूँगा। अतः उसे अनिष्टकी शङ्कासे सतत युद्धविरामकी इच्छा बनी रहती है।' यह सुनकर दीर्घ निःश्वासलेते हुए दुर्योधनने कहा—पिताजी, पिताजी !! यह आप क्या कह रहे हैं ? एक भी कनिष्ठ भ्राताकी मृत्यु हुए बिना ही युधिष्ठिरने ऐसी प्रतिज्ञा कर ली है तो क्या मैं ९९ भ्राताओंके¹ मरनेपर भी अपने प्राणोंकी ममतापर सन्धि कर लूँ—ऐसा कदापि नहीं हो सकता। अगर इस समय पराजयकी आशङ्कासे मेरी ममतापर यह सन्धि- प्रस्ताव आप रखेंगे तो राजाके क्षत्रियोचित धर्मकी मर्यादाका उच्छेद हो १. 'भ्रातॄणां निहते शते' (पृ० २०६) यहाँ 'शत' शब्द बहुल पर्यायवाची अर्थात् ९९ परक है। इसी प्रकार इस अङ्कमें यत्र-तत्र 'शत' शब्दसे यही अर्थ समझना चाहिए।