विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)
Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary
भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें५४ : विज्ञानभैरव [ धारणा-२५ ] १हृद्याकाशे निलीनाक्षः पद्मसंपुटमध्यगः । अनन्यचेताः सुभगे परं सौभाग्यमाप्नुयात् ॥४८॥ हे सुभगे, हृदि भवे हृद्ये, हारिणि च आकाशे प्राणापानान्तरालपदे निलीनाक्षः, निलीनमक्षं मनस्तद्द्वारेण चान्येन्द्रियचक्रं यस्य तादृक्, पद्मसंपुटमध्यगः ऊर्ध्वाधरगत- पद्मसंपुटमध्यंगतो भावनयाऽनुप्रविष्टः । ऊर्ध्वगतं पद्मं प्रमाणम्, अधरगतं प्रमेयम् । तयोर्मध्ये चिन्मात्राख्ये प्रमातरि स्वस्वरूपे स्थितः । अत एव अनन्यचेताः, नान्यस्मि- श्चिन्मात्रातिरिक्ते चेतो यस्य तादृशः सन्, परं सौभाग्यं विश्वेश्वरतास्वरूपं परमानन्दम्, आप्नुयात् प्राप्नुयात् । हृत्पद्मे बद्धबाह्याभ्यन्तरेन्द्रियचक्रस्य बाह्यविषयोपरमादाभ्यन्त- रोदयः संभवेदित्यर्थः । प्रमेयादिरूपस्य संसारस्य निमेषोन्मेषात्मकसंकोचविकासधर्म- कत्वात् पद्मसंपुटेन रूपणा ॥४८॥ हे सुभगे, हृदय में उत्पन्न हुए मनोहर आकाश में, अर्थात् प्राण और अपान के मध्यवर्ती२ स्थान में जिसका आन्तर और बाह्य इन्द्रियचक्र (मन और उससे नियन्त्रित चक्षुरादि इन्द्रियां) लीन हो जाता है और जो ऊर्ध्व स्थान और अधर स्थान में विद्यमान पद्मों के संपुट के मध्य में भावना के बल से प्रविष्ट हो गया है, अर्थात् ऊर्ध्वगत प्रमाण रूपी पद्म और अधःस्थित प्रमेय रूपी पद्म के मध्य में चिन्मात्र प्रमाता के अपने स्वरूप में स्थित हो जाता है और इसी लिये चिन्मात्रता के अतिरिक्त अन्य किसी वस्तु में जिसका चित्त संलग्न नहीं है, वह योगी विश्वेश्वरता रूप सौभाग्य के, परमानन्द के, विकसित हो जाने से अत्यन्त स्पृहणीय अवस्था को प्राप्त कर लेता है। अर्थात् बाह्य विषयों का उपराम हो जाने से उसमें आन्तर प्रकाश की अभिव्यक्ति हो जाती है। वहां प्रमेयादि रूप संसार का निमेष और उन्मेष व्यापार पद्मदल के संकोच और विकास के तुल्य है, इसीलिये इसकी पद्मसंपुट से तुलना की गई है। चित्त जब चित्प्रकाश से भर जाता है, तो वह चित्प्रकाश से परिव्याप्त इस सारे विश्व को में पंच तन्मात्रा, मन, अहंकार और बुद्धि की समष्टि को पुर्यष्टक बताया गया है। तन्मात्रा को विषयों (प्रमेय) का तथा अन्तःकरण को प्रमाण का उपलक्षक (प्रदर्शक) मान कर इस पंक्ति का यह सरल अर्थ किया जा सकता है कि ज्ञानी पुरुष की दृष्टि में प्रमाण और प्रमेय की कोई सत्ता न रह जाने से उसका संकुचित प्रमाता का स्वरूप तिरो- हित हो जाता है और निरावरण स्वात्मस्वरूप (शुद्ध प्रमाता = पर प्रमाता का स्वरूप) प्रकट हो जाता है। १. यह श्लोक शिवसूत्रविमर्शिनी (पृ० १६) और प्रत्यभिज्ञाहृदय (पृ० ८९) पर उद्धृत है। २. प्राण और अपान के मध्यवर्ती स्थान से यहां सुषुम्ना (मध्य) नाड़ी अभिप्रेत है। बाह्य और आन्तर इन्द्रियचक्र का, प्रमाण और प्रमेय व्यापार का, इसी में लय हो जाता है। हृदय के मध्य में इसकी स्थिति मानी गई है। Courtesy: Shri Tarun Dwivedi, Surviving Son of Late Vraj Vallabh Dwivediji (15 Jul 1926 - 17 Feb 2012)