विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)
Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary
भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंविज्ञानभैरव : ८३ ग्राहक प्रमाण उस समय निवृत्त हो जाते हैं। इस तरह से प्रमाता के अपने स्वरूप में प्रतिष्ठित होने से महान् आनन्द का आविर्भाव निश्चित रूप से हो जाता है। शिवसूत्रविमर्शिनी (पृ० ६३) में यह श्लोक भी उद्धृत है। महेश्वरानन्द ने परिमल व्याख्या (पृ० १३) में महाप्रकाश की अभिव्यक्ति के साधन के रूप में इस धारणा का उल्लेख किया है, तथा इसी प्रसंग में— वीणावादनतत्त्वज्ञः स्वरशास्त्रविशारदः। तालज्ञश्चाप्रयासेन मोक्षमार्गं निगच्छति ॥ (३।११५) याज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक को भी उद्धृत किया है। अभिनवगुप्त ने तन्त्रा- लोक के— तथाहि मधुरे गीते स्पर्शे वा चन्दनादिके ॥ माध्यस्थ्यविगमे याऽसौ हृदये स्पन्दमानता । आनन्दशक्तिः सैवोक्ता•••• •••• •••• ••• ••••• ॥ (३।२०९-२१०) शब्दोऽपि मधुरो यस्माद् वीर्योपचयकारकः। तद्धि वीर्यं परं शुद्धं बिसिसृक्षात्मकं मतम् ॥ (३।२२९) इत्यादि श्लोकों में इसी विषय का प्रतिपादन किया है और टीकाकार जयरथ ने दोनों ही स्थलों में प्रस्तुत श्लोक को प्रमाण मानकर इस विषय की महत्ता का प्रतिपादन किया है। जयरथ ने इस प्रसंग में— ये ये भावा ह्लादिन इह दृश्याः सुभगसुन्दराकृतयः। तेषामनुभवकाले स्वस्थितिपरिपोषणं सतामर्चा ॥ प्रशस्तिभूतिपाद के इस श्लोक को भी उद्धृत किया है, जिसमें कि पूर्व श्लोक में उद्धृत योगिनीहृदयदीपिका के वचन के समान इस स्थिति को परा पूजा बताया गया है ॥७२॥ [ धारणा-५० ] ¹यत्र यत्र मनस्तुष्टिर्मनस्तत्रैव धारयेत् । तत्र तत्र परानन्दस्वरूपं ²संप्रवर्तते ॥७३॥ मनस्तुष्टिरिति मनसः प्रमोदः, न तु मनसः क्षोभः । यस्मिन् यस्मिन् वस्तुनि मनोहरे कामिनिवदनकमलादौ ज्ञानेन्द्रियकर्मेन्द्रियविषयेषु मनः सज्जते, तत्रैव धारयेत् स्थिरं कुर्यात्, न तु मनोनियमनमकृत्वा नानाविधविकल्पक्षोभैः स्वात्मानं भोगा- रूढत्वदशाया अधः पातयेत् । मनसो धारणमपि कामादिक्षोभं प्रशमय्य, अत्र नितम्बिनी- सुन्दरकायमन्दिरे चिदात्मकः शिवोऽहमस्मि, ममैवेयं भङ्गिरिति यथाशक्ति कामादिक्षोभं स्वात्मनि प्रशमय्य, एकाग्रां निश्चलां मतिं विधाय कुर्यात् । अनया धारणया यत्र शुभे वाऽशुभे वा मनो लगति तत्र तत्र योगिनः परानन्दस्वरूपं संप्रवर्तते संप्रकाशते ॥७३॥ १. °प्:-ख० । २. संप्रकाशते-ख०, यो०, प्र० ।
- प्रत्यभिज्ञाहृदय (पृ० ९०) और योगिनी० दी० (पृ० ३३९) में यह मिलता है।