भारतकोश
विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)

विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)

Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary

भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished256 पृष्ठ

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१०२ : विज्ञानभैरव संक्षेप में इसका अभिप्राय यह हुआ कि अकार अर्थात् परम शिव के नाद और बिन्दु अवस्था से अतीत शुद्ध स्वरूप का चिन्तन करने पर साधक सनातन ब्रह्मस्वरूप में विलीन हो जाता है ॥८८॥ [ धारणा-६६ ] वर्णस्य¹ सविसर्गस्य विसर्गान्तं² चितिं कुरु । निराधारेण चित्तेन स्पृशेद् ब्रह्म सनातनम् ॥८९॥ निराधारेण प्रक्षीणवेद्येन चित्तेन सविसर्गस्य विसर्गसहितस्य वर्णस्य अकारस्य विसर्गान्तं चितिं कुरु विविधसर्गस्वभावयुक्तस्य वर्णजातेः ककाराद्यक्षररूपस्य ब्राह्म्या- दिशक्तिसमूहस्य पशुभावोपकरणस्य विसर्गस्य अन्तो यथा भवति तथा अन्तर्मुख- स्वभावविमर्शाधिक्यात् तत्समावेशेन तन्मयीभावापादनस्वरूपतया बुद्धिं विधेहि। ततः संवेदनस्य निराश्रयत्वे सति सनातनं ब्रह्म विशेत्, नित्यः परब्रह्मस्पर्शाविर्भावः स्यात् । 'विसर्गान्ते' इति सप्तम्यन्तपाठे त्वयमर्थः—सर्वोऽयं मातृकाप्रपञ्चोऽकुलस्य शिवबिन्दु- नामधेयस्य शक्तिरूपो विसर्ग इति तस्मिन् विसर्गे बुद्धिं विधेहीति ॥८९॥ किसी जानने लायक वेद्य वस्तु के अभाव में चित्त निराधार हो जाता है। चित्त की इस अवस्था में विसर्ग के साथ आद्य वर्ण अकार में अपनी धारणा को स्थिर करे । अकार के द्वारा नाना प्रकार की सृष्टि करने में ककार प्रभृति अक्षरों का और उनकी अधिष्ठात्री ब्राह्मी प्रभृति मातृकाओं का सहयोग रहता है । इन्हीं की सहायता से अज्ञानी जीव का सारा व्यव- हार चलता है। अतः यह सारी सृष्टि भी विसर्ग के नाम से ही जानी जाती है । इसका अन्त किये बिना स्वात्मस्वरूप की अभिव्यक्ति नहीं हो सकती । अनुत्तर अकार विसर्ग की सहायता से ही सभी ककार प्रभृति वर्णों की और सारे जगत् की सृष्टि करता है, अतः इस विसर्ग का अकार में उपसंहार करने पर ही इस सारी सृष्टि का उपसंहार हो सकता है । प्रस्तुत धारणा में अकार की इस उपसंहार दशा में ही निराधार चित्त को स्थिर करने का अभ्यास किया जाता है, जिससे कि अपने अन्तर्मुख स्वभाव का गहराई से चिन्तन करने से साधक अपने स्वरूप में समाविष्ट हो जाता है। जब वह अपने स्वरूप में समाविष्ट होता है, तो उसके अपने स्वाभाविक स्वरूप के अभिव्यक्त हो जाने से उसका अब तक का काल्पनिक स्वरूप उसी में लीन हो जाता है, उसी आकार को धारण कर लेता है । उसकी अलग से कोई सत्ता नहीं रह जाती । साधक जब अपनी चित्त-वृत्ति को भी तदाकार बना लेता है, तब संवेदन अर्थात् ज्ञान का कोई बाह्य आलम्बन न रहने से उसका परब्रह्म स्वरूप में नित्य समावेश हो जाता है । 'विसर्गान्ते' ऐसा पाठ मानने पर उसका अर्थ यह होगा—यह सारा स्वर-व्यंजनात्मक मातृका का विस्तार, सभी वर्णों की उत्पत्ति शिवबिन्दु नामक शक्ति से ही होती है। यह कौलिकी शक्ति विसर्ग नाम से जानी जाती है। इसी से सारी वर्णमाला का विकास होता है । इस १. सविसर्गस्य वर्णस्य-ख० । २. ॰न्ते-ख० ।