भारतकोश
विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)

विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)

Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary

भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished256 पृष्ठ

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विज्ञानभैरव : ११५ दूसरा अर्थ किया गया है । घट-पट आदि सभी पदार्थों में अस्मदादि विषयक ज्ञान अथवा इच्छा प्रभृति भाव विद्यमान हैं, यह कह कर आप क्या सिद्ध करना चाहते हैं ? इससे हम यह सिद्ध करना चाहते हैं कि हमारे ज्ञान के घट आदि में संक्रान्त हो जाने से वे भी ज्ञानवान् हो जाते हैं । सदाशिव प्रभृति जैसे क्रिमि-कीट पर्यन्त सभी पदार्थों को अपने से अभिन्न मानते हैं और उनको चाहते हैं, उसी तरह क्रिमि-कीट भी अस्मदादि से लेकर सदाशिव पर्यन्त सभी को जानते हैं और उनको चाहते हैं । ज्ञान और क्रिया की इस समानता के आधार पर जगत् के सभी पदार्थ सर्वात्मक हैं । इस तरह की धारणा का अभ्यास करने वाला योगी सर्वत्र व्याप्त हो जाता है । यही विषय सोमानन्द की शिवदृष्टि में भी प्रतिपादित है— घटो मदात्मना वेत्ति वेद्म्यहं च घटात्मना ॥ सदाशिवात्मना वेत्सि स वा वेत्ति मदात्मना । नानाभावैः स्वमात्मानं जानन्नास्ते स्वयं शिवः ॥ (५।१०५-१०६, १०९) सभी भावों की सर्वात्मकता का प्रतिपादन शिवदृष्टि के प्रथम और पंचम आह्निक के अन्त में विस्तार से किया गया है । यह वहीं अवलोकनीय है ।।१०३।। [ धारणा-८१ ] १ग्राह्यग्राहकसंवित्तिः सामान्या सर्वदेहिनाम् । योगिनां तु विशेषोऽयं१ संबन्धे सावधानता ।।१०४।। सर्वदेहिनां सदाशिवादिकीटान्तानाम् इदं ग्राह्यम् अयं ग्राहक इत्यादिना यो व्यवहारः स सामान्य एव । यदेको जानाति तदपरोऽपि जानातीति नात्र कश्चन विशेष इति भावः । परन्तु योगिनामयमेव विशेषः—सम्बन्धे ग्राह्यग्राहकस्वरूपावधारणे सावधानता ग्रहीतृरूपाविस्मरणम् ।।१०४।। सदाशिव से लेकर कीट पर्यन्त सभी प्राणियों में यह वस्तु ग्राह्य है और यह प्रमाता उसका ग्राहक है, इस तरह का व्यवहार समान रूप से विद्यमान है । इनके संवेदन (ज्ञान) में परस्पर कोई विशेषता या विलक्षणता नहीं है, क्योंकि किसी वस्तु को एक प्रमाता जिस तरह से देखता है, दूसरा प्रमाता भी उसी तरह से देखता है । यह तो योगियों की ही विशेषता है कि वे सम्बन्ध के प्रति अधिक सावधान रहते हैं, अर्थात् ग्राह्य और ग्राहक के स्वरूप का अवधारण करते समय उनको अपने चित् स्वरूप की कभी विस्मृति नहीं होती और वे इस १. ॰षोऽस्ति-क० ।

  1. शिवसूत्रविमर्शिनी (पृ० १८, ६८), महा० परि० (पृ० १५४), तन्त्रा० वि० (भा० ७, आ० १०, पृ० १४०), ई० प्र० वि० वि० (भा० १, पृ० ७७; भा० २, पृ० ४०५), प्रत्यभिज्ञाहृदय (पृ० ३८) में यह श्लोक उद्धृत है । नेत्रतन्त्र० (भा० २, पृ० ३७), ई० प्र० वि० वि० (भा० २, पृ० ५०; भा० ३, पृ० ३०, ५२) में केवल चतुर्थ चरण उद्धृत है ।