भारतकोश
विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)

विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)

Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary

भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished256 पृष्ठ

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विज्ञानभैरव : १४३ अर्थात् मेरी स्थिति सदा रहे, ऐसा न हो कि मैं कभी न रहूँ, इस तरह का प्रेम आत्मा में देखा जाता है । इस आत्मप्रेम से बढ़कर और कोई प्रेम नहीं है, अतः आत्मा को परमानन्द- स्वभाव मानना पड़ता है । भट्ट उत्पल ने भी अपनी स्तोत्रावली में कहा है— त्वमेवात्मेश ! सर्वस्य सर्वश्चात्मनि रागवान् । इति स्वभावसिद्धां त्वद्भक्तिं जानन् जयेज्जनः ॥ (१।७) अर्थात् हे स्वतन्त्र प्रभु, आप ही प्रत्येक पुरुष की आत्मा हैं और प्रत्येक पुरुष अपनी आत्मा से अनुराग रखता है । इस प्रकार स्वभावतः, अर्थात् अनायास ही होने वाली आपकी भक्ति को जो भक्त अपनी समावेश दृष्टि से जान लेता है, वह इस संसार को जीत लेता है । इस दृष्टि से विचार करने पर यहाँ न तो कोई अज्ञानी ही है और न कोई ज्ञानी अथवा परम ज्ञानी ही है, किन्तु स्वतन्त्र परमेश्वर ही इन सभी रूपों में भासित होता रहता है । अज्ञानी, ज्ञानी और परम ज्ञानी की कल्पना से उस परमेश्वर का स्वातन्त्र्य नष्ट हो जाता है । इसलिये ¹अप्रबुद्ध, प्रबुद्ध, सुप्रबुद्ध आदि विकल्पों से मुक्त होकर साधक को शान्तभाव से स्वात्मस्वरूप का चिन्तन करते रहना चाहिये । इसका अभिप्राय यह है कि "इस जगत् में नाना पदार्थों की कोई सत्ता नहीं है" इस श्रुति वचन के अनुसार मन को निराधार (निर्वि- कल्प) बना कर अपने परमार्थ स्वरूप के ध्यान का अभ्यास करने से चित्त शान्त हो जाता है, उसको एक प्रकार का बल प्राप्त होता है, जिससे कि साधक के सभी प्रकार के द्वन्द्व शान्त हो जाते हैं और उसको परम निर्वाण की प्राप्ति हो जाती है ॥१२८॥ [ धारणा-१०६ ] नित्यो विभुर्निराधारो व्यापकश्चाखिलाधिपः । शब्दान् प्रतिक्षणं ध्यायन् ¹कृतार्थोऽर्थानुरूपतः ॥१२९॥ विभुः परमेश्वरः, नित्य-निराधार-व्यापक-अखिलाधिपत्वादिरूप इति अर्थानु- रूपतः अर्थानुसन्धानपूर्वकं तान् शब्दान् प्रतिक्षणं मुहुर्मुहुः ध्यायन् चिन्तयन् कृतार्थः कृतकृत्यो भवति । जानामि, करोमीत्यत्रैव मुक्तस्वभावः स्यादिति भावः ॥१२९॥ स्वतन्त्र-स्वभाव प्रभु परमेश्वर नित्य, निराधार, व्यापक और सारे जगत् का स्वामी है, इस तरह से नित्य आदि शब्दों के अर्थ का बार-बार अनुसन्धान करते हुए जो साधक १. प्रकृतार्था-ख० ।

  1. अप्रबुद्ध, प्रबुद्धकल्प, प्रबुद्ध, सुप्रबुद्धकल्प और सुप्रबुद्ध—इन पाँच प्रकार के प्रमाताओं का विवेचन विरूपाक्षपंचाशिका की ४१-४४ कारिकाओं में किया गया है । स्पन्दकारिका के १७, १९-२०, २५, ४४ संख्या के श्लोकों में अप्रबुद्ध, प्रबुद्ध और सुप्रबुद्ध का स्वरूप वर्णित है । इन शब्दों की चर्चा पहले भी हो चुकी है ।