विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)
Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary
भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१४६ : विज्ञानभैरव इनकी कोई पारमार्थिक सत्ता है। वस्तुतः परिदृश्यमान सभी पदार्थ शून्य में प्रतिष्ठित हैं, अर्थात् शून्यस्वरूप हैं। इस शून्य से ही शक्ति की प्रवृत्ति होती है। शक्ति से वर्ण पैदा होते हैं। वर्णों से मन्त्र और मन्त्रों से यह कभी नष्ट न होने वाली सृष्टि होती है। इसलिये इस जगत् की शून्य के रूप में ही उपासना करना चाहिये। ऐसा करने वाला साधक कभी नष्ट नहीं होता। इस तरह से ज्ञान और क्रिया के विषय के रूप में, ज्ञेय और कार्य के रूप में भासित हो रहे इस जगत् की कोई वास्तविक सत्ता नहीं है, इस वस्तुस्थिति का ज्ञान जिसको भली भाँति हो गया है, उसको अनुत्तर भाव की, पारमार्थिक शिवस्वरूप की अधिगति (प्राप्ति) हो जाती है। जब ज्ञान और क्रिया की ही कोई वास्तविक स्थिति नहीं है, तो उनके विषय के रूप में प्रतीत हो रहे ज्ञेय, कार्य आदि पदार्थों की कल्पना कहाँ से होगी ? अर्थात् आधार के अभाव ये सब स्वयं कुछ भी सिद्ध नहीं हो पावेंगे। इस भावना के दृढ़ हो जाने पर निर्विकल्प स्वभाव योगी के चित्त में यह सारा जगत् निर्विकल्प रूप में ही भासित होता है। अर्थात् उसके चित्त में निर्विकल्प शिवभाव की अभिव्यक्ति हो जाती है ॥१३१॥ [ धारणा-१०९ ] १न मे बन्धो न मोक्षो मे 'भीतस्यैता विभीषिकाः । प्रतिबिम्बमिदं बुद्धेर्जलेष्विव विवस्वतः ॥१३२॥ मम चिन्मात्ररूपस्य न बन्धो मोक्षो वा, देशकालाद्यपरिच्छिन्नत्वात्, परिच्छि- न्नस्यैव बन्धमोक्षभावात् । केवलमेता बन्धमोक्षादिकल्पना मायाशक्तिवशादपरामृष्ट- स्वरूपस्य भीतस्यैव "द्वितीयाद्वै भयं भवति” (बृ० उ० १।४।२) इति द्वैतत्रस्तस्यैव, न तु चिदद्वैतपरामर्शशीलस्य। विभीषिका चटकभीत्युत्पादनशालिरक्षणार्थाः पलालपुरुषाद्याः। तत्त्वज्ञानिनस्तु किं करिष्यन्त्येताः-अनेन बन्धनम्, इदं न कर्तव्यम्, इदं कर्तव्यम्, अनेनैव मोक्षः-इत्याद्याः कल्पनाः। यथा विवस्वतः सूर्यस्य प्रतिबिम्बमेव प्रतीपं जल- मध्येऽस्ति, तथा बुद्धिरेव परिमितविषया बद्धोऽहं मुक्तोऽहमित्याकारा प्रतीपेति मम किमायातुम्, बुद्ध्याद्यवभासकत्वेन तदतीतत्वादिति बुद्धिमेव परित्यजेत् ॥१३२॥ मैं तो चिन्मात्रस्वरूप हूँ। अतः देश, काल आदि से परिच्छिन्न न होने के कारण मैं न तो किसी बन्धन में ही पड़ता हूँ और न उस बन्धन से मुझे किसी तरह का कोई छुटकारा ही मिलना है। परिच्छिन्न वस्तु में ही बन्ध और मोक्ष का व्यवहार होता है। यह सब बन्ध- मोक्ष आदि की कल्पना केवल उसी के लिये है, जो कि माया के कारण अपने स्वरूप को ठीक से न समझ पाने से भयभीत है। श्रुति में कहा गया है कि दूसरे से भय होता है। अतः द्वैत के भय से त्रस्त व्यक्ति के लिए ही बन्ध-मोक्ष आदि की कल्पना उसी तरह से की गई है, जैसे १. बाल°-ख० ।
- तन्त्रालोक विवेक (भा० २, आ० ३, पृ० २७) में यह श्लोक उद्धृत है।