भारतकोश
विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)

विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)

Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary

भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished256 पृष्ठ

पृष्ठ 21, कुल 256 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 21

( १० ) में नाद और बिन्दु की अपनी-अपनी व्याख्याएँ हैं । नादकारिका१ में नाद को मालिनी, महामाया, समना, अनाहत बिन्दु, अघोषा वाक्, ब्रह्मकुण्डलिनी बताया है । त्रिपुरा दर्शन२ में भगवती त्रिपुरसुन्दरी के निष्कल स्वरूप की स्थिति महाबिन्दु में मानी गई है । नाद और बिन्दु शब्द के प्रसंग में नित्याषोडशिकार्णव के उपोद्घात (पृ० ६३ और ९३) में हमने कुछ लिखा है । इस विषय पर भविष्य में विस्तृत विवेचन करने का हमारा विचार है३ । प्रस्तुत प्रश्न में पूछा गया है कि क्या यह परम तत्त्व नाद-बिन्दुमयं है ? ६. प्रणवकलामय छठा प्रश्न अर्धचन्द्र, निरोधिका (निरोधिनी) प्रभृति से सम्बद्ध है । प्रणव की १२ कलाओं के प्रसंग में इनका ग्रन्थ में जहाँ-तहाँ उल्लेख हुआ है । प्रणव की १२ कलाओं का विवेचन स्वच्छन्दतन्त्र (४।२५४-२८६) में एकादशपदिका के प्रकरण में और नेत्रतन्त्र के २१वें अधिकार (पृ० २८५-२९६) में भी मिलता है । इनमें से बिन्दु से लेकर उन्मना पर्यन्त ९ कलाओं का प्रणव के समान कामकला प्रभृति बीजाक्षरों, नवात्म प्रभृति पिण्ड४ मन्त्रों तथा ह्रींकार (शाक्त प्रणव), हूँकार (शैव प्रणव) प्रभृति बीज मन्त्रों के उच्चारण में भी होता है । योगिनीहृदय के 'दीपाकारोऽर्धमात्रश्च' से लेकर 'तथोन्मनी । निराकारा'५ (१।२८-३५) पर्यन्त श्लोकों में इनका आकार, स्वरूप, उच्चारण काल और स्थान वर्णित है । योगिनीहृदय के आधार पर यह विषय वरिवस्यारहस्य में भी प्रतिपादित है । इस ग्रन्थ के अड्यार संस्करण के अन्त में दिये गये एक चित्र में इनके आकार को दिखाया गया है । योगिनीहृदय के अनुसार बिन्दु का स्वरूप दीपक के समान प्रभास्वर है । ललाट में गोल बिंदी के रूप में इसकी भावना की जाती है और इसका उच्चारण काल ६अर्धमात्रा है । १. “सिद्धो नादः परसुमङ्गला मालिनी महामाया । समनाऽनाहतबिन्दुरघोषा वाग् ब्रह्म- कुण्डलिनीतत्त्वम् ।। विद्याख्यं चेत्युक्तस्तैस्तैः शब्दैस्तदागमेष्वित्थम् ।” शतरत्नसंग्रह (पृ० ४०) में नादकारिका के नाम से उद्धृत ये पंक्तियाँ अष्टप्रकरण में मुद्रित नादकारिका में उपलब्ध नहीं होतीं । इसके लिये लु० सं० उपोद्घात (पृ० १३९, टि० १) देखिये । २. द्रष्टव्य—योगिनीहृदयदीपिका (१।२७-२८) । ३. लु० सं० उपोद्घात (पृ० १३९-१४३) मूल एवं टिप्पणियों में नाद और बिन्दु विषयक सामग्री देखिये । ४. पिण्ड मन्त्र, बीज मन्त्र आदि के परिचय के लिये नित्याषोडशिकार्णव का उपोद्घात (पृ० ६९, टि० २) द्रष्टव्य । ५. योगिनीहृदय में प्रथम पटल के ३४वें श्लोक के बाद 'निराकारा महाबिन्दौ तदूर्ध्वं शून्य एव च' इस श्लोकार्ध की स्थिति मानी जानी चाहिये । दीपिका में इसकी व्याख्या मिलती है । ६. 'अर्धमात्रास्थिता' (१।७४) प्रभृति दुर्गा सप्तशती के श्लोक की व्याख्या (गुप्तवती) में भास्करराय ने—"अनुच्चार्या अर्धचन्द्रनिरोधिन्यादिध्वन्यष्टकरूपा" ऐसा कह कर अर्ध- मात्रा में ही इन सबकी स्थिति मानी है ।