विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)

विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)
Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary
भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished256 पृष्ठ
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विज्ञानभैरव : १६९
उत्पन्न करती है और उनको अपने में विलीन भी कर लेती है। यह महादेवी द्वादशान्त स्थित आकाश में सकार के रूप में तटस्थ भाव से रहती है और उसी के बगल में अन्तःकरण और बहिरिन्द्रिय के प्रतीकभूत विसर्ग स्वभाव हकार के रूप में। इस तरह इसकी यह अजपा स्थिति अन्यपदेश्य अर्थात् नाम और रूप के द्वारा समझने लायक न होने पर भी धीरे-धीरे स्थूल आकार धारण करने लगती है। इसके आकार का विस्तार होने पर ही द्वैत-संपत्ति को बढ़ाने वाले, नानात्व का प्रसार करने वाले, दिन रात, सुख-दुःख प्रभृति अनेक द्वन्द्वात्मक पदार्थों की सृष्टि होती है। यह महादेवी सभी तरह के पापों का नाश कर देने के कारण तथा सबकी रक्षक होने से सही माने में श्रेष्ठ तीर्थभूमि है। कुरुक्षेत्र प्रभृति तीर्थ इसकी बराबरी नहीं कर सकते। इस तरह से अपने स्वरूप का विस्तार करने के कारण यह दीर्घात्मा महादेवी इस द्वैत दशा में परापरा अवस्था में रहती है, क्योंकि यहाँ 'अहम्' (मैं) का बोध प्रधान रहता है और इदम् (यह) यह का बोध अप्रधान (गौण)। तत् और अस्मत् शब्द के अर्थ में कोई भेद नहीं है, किन्तु तत्ता (उसका) और मत्ता (मेरा), इदन्ता और अहन्ता के रूप में निर्देश करने पर भेद की भी प्रतीति होती है। अतः इस परापरा अवस्था में भेद और अभेद दोनों स्थितियाँ विद्यमान रहती हैं। हंस मन्त्र को अजपा इस लिये कहा जाता है कि अपरा अवस्था में यद्यपि इसके वाच्य वर्ण हकार और सकार का उच्चारण स्पष्ट होता है, किन्तु जब परा देवी इनको अपने में समेटे हुए अपने बाह्य स्वरूप का संवरण करती है, उस समय हकार के मस्तक पर स्थित बिन्दु रूप अनुस्वार का केवल बिन्दु के रूप में जप नहीं किया जा सकता। इसी तरह से यह प्राणशक्ति जब बाहर निकलती है, तब सकार के आगे विसर्ग रूप में स्थित दो बिन्दुओं का बिना अकार के उच्चारण नहीं हो सकता। इसीलिये 'हंसः' इस मन्त्र की अजपा गायत्री के रूप में ख्याति है। हंस मन्त्र वर्ण-क्रम से जैसे 'अजपा' रूप से प्रसिद्ध है, उसी तरह से यह 1संवित्क्रम से भी 'अजपा' स्थिति में ही रहता है। संवित् के प्रकाश से ही सभी शब्दों का स्फुरण होता है। उस संवित् के स्फुरण के लिये किसी अन्य पदार्थ की आवश्यकता नहीं रहती, वह तो स्वयंप्रकाश है, क्योंकि उसको प्रकाशित करने वाली दूसरी कोई संवित् नहीं है। स्वप्रकाश वस्तु को दूसरे प्रकाश की आवश्यकता नहीं रहती, जैसे कि एक दीपक को प्रकाशित करने के लिये दूसरे दीपक की जरूरत नहीं पड़ती। प्रश्न उठता है कि अभी बताया गया है कि हंस मन्त्र का उच्चारण जीवावस्था में ही होता है। इस प्रकार यह जीव दशा का मन्त्र है। तब इस जीवदशा (परिमित अहन्ता) के
- नित्याषोडशिकार्णव की अर्थरत्नावली टीका (पृ० ३, ३४-३९) में वर्ण, मण्डल (चक्र), मन्त्र, धाम और संवित् नामक क्रम दर्शन के पांच प्रमेयों का प्रतिपादन किया गया है। महार्थमंजरी (पृ० ८९-९४) में वृन्दचक्र के अन्तर्गत धाम, मुद्रा, वर्ण, कला, संवित्, भाव, पात और अनिकेत इन आठ पदार्थों की व्याख्या की गई है। प्रस्तुत प्रकरण में वर्णक्रम और संवित्क्रम से इन्हीं प्रमेयों की ओर इंगित है। जिज्ञासु जनों को इनके स्वरूप का परिचय वहीं से प्राप्त करना चाहिये।