विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)
Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary
भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंविज्ञानभैरव : १७१ मुक्ति की प्राप्ति होती है। कुम्भक अवस्था में प्राण और अपान की गति का अवरुद्ध हो जाना योगियों को भी अभीष्ट है। इसीलिये यहाँ 'क्षीयते तौ' अर्थात् प्राण और अपान क्षीण हो जाते हैं, ऐसा कहा गया है। यदि ऐसा न हो तो व्यर्थ की सारी आयु गँवा करके भी मनुष्य जन्म और मरण के निरन्तर बहने वाले प्रवाह को रोक न पावेगा। श्रुति और स्मृति ग्रन्थों में तो दिन और रात्रि का यमराज के कुत्तों के रूप में वर्णन मिलता है, क्योंकि ये मृत्यु के सन्देशवाहक दूत हैं। ये निरन्तर प्राणियों की आयु को क्षीण करते रहते हैं और अन्त में उनको मार डालते हैं। ऋग्वेद के यमसूक्त (१०।१४।११) में बताया गया है कि यम के रक्षक ये दिन-रात्रि रूपी दो कुत्ते बड़ी चतुराई से पहरा देते रहते हैं, अर्थात् दिन के विश्राम लेने पर रात्रि पहरा देने लगती है और रात्रि के विश्राम लेने पर पुनः दिन पहरा देने आ जाता है। इस तरह से निरन्तर चौकसी करते रहते हैं। 'चतुरक्षौ' इस पद की निष्पत्ति 'शकन्धु' आदि की तरह होती है। इसका विग्रह 'चतुरं निपुणमक्षं चक्रभ्रमणं ययोस्तौ' इस तरह से होता है। यहाँ 'अक्ष' शब्द चक्र का वाचक है। चक्र शब्द से परिवर्तन लक्षित होता है। इस तरह से 'चतुरक्षौ' का संस्कृत पर्याय 'चतुरचक्रौ' होगा। यम के दूत इन कुत्तों का वर्णन इस स्मृतिवचन में भी मिलता है— श्वानौ द्वौ श्यावशबलौ वैवस्वतकुलोद्भवौ। ताभ्यां पिण्डं प्रदास्यामि स्यातां मे तावहिंसकौ ॥ वैवस्वत (यमराज) के कुल में उत्पन्न श्याव (काला) और शबल (चितकबरा) वर्ण वाले इन दोनों कुत्तों को मैं पिण्ड देता हूँ, ये मेरे लिये अहिंसक हो जायें, अर्थात् मुझे कुछ हानि न पहुँचावें। यहां श्याव (कृष्ण) वर्ण का कुत्ता रात्रि और शबल (चितकबरा) वर्ण का कुत्ता दिन है। दिन को शबल इसलिये कहा जाता है कि यह प्रातःकाल लाल वर्ण का, मध्याह्न में शुक्ल वर्ण का और सायंकाल काले वर्ण का दिखाई पड़ता है। वैवस्वत मृत्यु का नाम है। उसके घर में उत्पन्न होने से, उसके रक्षक होने से और मनुष्य की आयु का हरण करने वाले होने से ये मृत्यु के दूत कहे जाते हैं। उनके लिये मैं अपने पांचभौतिक शरीर को ही पिण्ड (ग्रास) के रूप में दे दूंगा, अर्थात् शरीर में अपनी ममता छोड़ दूँगा। लोक में यह बात प्रसिद्ध है कि कुत्ते को भात आदि का पिण्ड बना कर दिया जाता है। दिन-रात के बदलते रहने से अन्ततः यह पांचभौतिक शरीर जरा-जीर्ण होकर एक दिन गिर पड़ता है, अतः लौकिक दृष्टि से उसके अभाव में भात आदि का पिण्ड बना कर देने की बात ठीक है। मैं तो चिद्रूप हूँ, अविनाशी हूँ। दिनरात की गति के परिवर्तन को जब मैं प्राण और अपान की गति के परिवर्तन के साथ योगाभ्यास की अजपा प्रक्रिया से जोड़ देता हूँ, तो उस परिस्थिति में ये यमराज के कुत्ते मेरा कुछ भी नहीं बिगाड़ सकेंगे। इसी अभिप्राय से उक्त श्लोक में 'स्याताम्' इस पद में सम्भावना के अर्थ में लिङ् लकार का प्रयोग किया गया है। कुत्ता काट न खाय, अपने दांत न गड़ा दे, इसके लिये उससे अपनी रक्षा अवश्य करनी पड़ती है। योग से, ध्यान से जब इन प्राण और अपान रूपी कुत्तों की गति क्षीण हो जाती है, तभी योगी दीक्षा का अधिकारी होता है, अर्थात् उसको ज्ञान की प्राप्ति होती है और उसकी पशु अवस्था की, अज्ञानावस्था