विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)
Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary
भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( ३६ ) की इस ग्रन्थ में अनेक बार आवृत्ति हुई है । इस ग्रन्थ के उपशम१ प्रकरण पर विज्ञानभैरव का सर्वाधिक प्रभाव है। स्पन्द, समता, पौरुष प्रयत्न (ज्ञान या शक्ति), बन्ध-मोक्ष, प्रबुद्ध, संप्रबुद्ध, अप्रतिबुद्ध, कलङ्काङ्क, सत्तासामान्य, उच्छून, चिदग्नि, महासत्ता, चिदर्क, भरितात्मता, शक्ति- पात, ब्रह्मसत्ता, जीवन्मुक्ति, पुर्यष्टक प्रभृति शब्दों की व्याख्या पूरी तरह से उक्त शास्त्रों की परिभाषाओं का ही अनुसरण करती है । इस तरह से इस पूरे ग्रन्थ का विनियोग २अनुपाय प्रक्रिया (सहज योग) के प्रतिपादन में ही है । तन्त्रशास्त्र में३ शास्त्र, गुरु और स्वयं अपनी प्रतिभा से ज्ञान की प्राप्ति की बात कही गई है । किन्तु योगवासिष्ठ का कहना है कि ४शास्त्र या गुरु के वचन से आत्मा का बोध (ज्ञान) नहीं होता, इसका ज्ञान तो स्वयं अपने बोध से ही होता है । इस तरह से सत्तर्क को ही यहाँ सर्वोपरि स्थान दिया गया है । योगवासिष्ठ के विषय में एक बात और ध्यान देने योग्य है । अभिनन्द पण्डित ने अपने लघुयोगवासिष्ठ में निर्वाण प्रकरण के पूर्वार्ध पर्यन्त ग्रन्थ का ही संक्षेप प्रस्तुत किया है । मूल ग्रन्थ में भी पूर्वार्ध प्रकरण के अन्त में ग्रन्थ समाप्ति के सभी चिह्न उपलब्ध हैं । अतः ऐसा प्रतीत होता है कि इस ग्रन्थ में निर्वाण प्रकरण का उत्तरार्ध बाद में जोड़ा गया है । विज्ञानभैरव का मुख्य तात्पर्य हमने बताया है कि विज्ञानभैरव में पूर्ववर्ती सभी तान्त्रिक योगविधियों का संग्रह किया गया है, किन्तु अन्ततः इसका विनियोग अनुपाय प्रक्रिया (सहज समाधि) के प्रतिपादन में है । १. “न बहिर्नान्तरे नाधो नोर्ध्वमर्थे न शून्यके” (५।५।१६), “सावस्था भरिताकारा” (६।४।४७), “न सक्तमिह चेष्टासु न चिन्तासु न वस्तुषु । नाकाशे नाप्यधो नोर्ध्वं न दिक्षु वित- तासु च ॥ न बहिर्विपुलाभागे न चैवेन्द्रियवृत्तिषु । नाभ्यन्तरे न च प्राणे न मूर्धनि न तालुनि ॥ न भ्रूमध्ये न नासान्ते न मुखे न च तारके । नान्धकारे न चाभासे न चास्मिन् हृदयान्तरे ॥ न जाग्रति न च स्वप्ने न सुप्ते न च निर्मले । नासिते न च वा पीतरक्तादौ शबले न च ॥ न चले न स्थिरे नादौ न मध्ये नेतरत्र च । न दूरे नान्तिके नाग्ने न पदार्थे न चात्मनि ॥ न शब्दस्पर्शरूपेषु न मोहमदवृत्तिषु । न गमागमचेष्टासु न कालकलनासु च ॥” (६।९।२-७) । इन वचनों में से द्वितीय विज्ञानभैरव के १५ वें श्लोक का तृतीय चरण है। इसकी यहाँ अनेक स्थलों पर आवृत्ति हुई है । अन्य दो उद्धरणों में विज्ञानभैरव में वर्णित अनेक धारणाओं का उल्लेख है । २. “वर्णधर्माश्रमाचारशास्त्रयन्त्रणयोज्झितः । निर्गच्छति गतज्जालात् पञ्जरादिव केसरी ॥” (नि० पू० १२२।२), “तनुं त्यजतु वा तीर्थे श्वपचस्य गृहेऽथवा” (नि० पू० १२२।११) इत्यादि वचनों में सिद्धों की सहज प्रक्रिया के स्पष्ट दर्शन होते हैं । ३. “त्रिप्रत्ययमिदं ज्ञानम्”, “गुरुतः शास्त्रतः स्वतः” इत्यादि वचन ग्रन्थ की पृ० २ की ३री टिप्पणी में उद्धृत हैं । ४. शास्त्राथैर्बुध्यते नात्मा गुरोर्वचनतो न च । बुध्यते स्वयमेवैष स्वबोधवशतः स्वतः ॥ (नि० पू० ४१।१५)