विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)
Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary
भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( ४० ) करते-करते वह बौद्ध और पौरुष अज्ञान से आवृत हो जाता है और इस तरह से उसकी शक्तियाँ और स्वरूप संकुचित हो जाते हैं । संकुचित प्रमाता के रूप में वह अपने स्वरूप को भूल बैठता है। यह स्वरूप की विस्मृति ही इनके यहाँ बन्ध है और स्वरूप की स्मृति ही मोक्ष कहलाती है । इस तरह से इनके मत में बन्ध और मोक्ष की कोई वास्तविक सत्ता नहीं है । इनकी दृष्टि में यह सारा विश्व 'अहम्' का ही विलास है । चित्रकार कागज, कपड़ा या दीवाल पर अपनी कल्पना का चित्र बनाता है। यह शिव ऐसा अनोखा चित्रकार है कि बिना आधार के अपने आप में इस विश्व के उन्मीलन और निमीलन की लीला करता रहता है । अपनी अहन्ता को वह परिमित प्रमाता के रूप में भौतिक शरीर तक सीमित कर देता है और फिर वही पर प्रमाता के रूप में इस पूरे विश्व में विश्वाहन्ता के रूप में इसका विस्तार कर लेता है । इस स्थिति में वह इस पूरे विश्व को अपना कुटुम्ब नहीं, किन्तु स्वयं अपना ही स्वरूप मानता है । शक्तिसंगम तन्त्र में समताष्टक मार्ग का उल्लेख है । इसका परिचय हमने पृ० ७१ पर दिया है । सन्तों और भक्तों की परम्परा से और योगवासिष्ठ जैसे ग्रन्थों के माध्यम से यह समता दृष्टि भारतीय जनमानस में सामान्य रूप से अपना स्थान बनाये हुए हैं। महात्मा गाँधी में इसी दृष्टि का उन्मेष हुआ था । किन्तु आज इस समता दृष्टि के मूल स्रोत को हमने भुला दिया है । आज का प्रबुद्ध भारतीय इस साम्यवाद की खोज में उस कस्तूरी मृग की भाँति भटक रहा है, जिसको इसका ज्ञान नहीं है कि उस मनोमोहक गन्ध का स्वामी वह स्वयं ही है। आज इस बात की आवश्यकता है कि जैसे तत्कालीन सभी धर्मों की उदात्त भावनाओं में समन्वय स्थापित कर मानव मात्र के कल्याण के लिये तान्त्रिक धर्म की प्रतिष्ठा की गई थी, उसी तरह से विश्व के सभी धर्मों की उदात्त भावनाओं में समरसता, समन्वय स्थापित कर एक विश्व-धर्म और विश्व-संस्कृति की प्रतिष्ठा की जाय । भारतीय समाजवाद के प्रवर्तक आचार्य नरेन्द्रदेव ने भारतीय संस्कृति और समाज- वाद में सुन्दर समन्वय स्थापित किया था। उनका१ कहना था कि संस्कृति २चित्तभूमि की खेती है । व्यक्तियों के चित्त के साथ-साथ लोकचित्त के कार्यक्षेत्र का विस्तार आवश्यक है । लोकचित्त का राष्ट्रचित्त में और विश्वचित्त का विश्वसंस्कृति के रूप में विकास अभिप्रेत है । जीवन और संस्कृति दोनों परिवर्तनशील हैं । कालप्रवाह से जीर्ण और अनुपयोगी पुराने विचारों के परित्याग के साथ श्रैणिक नैतिकता के नाम पर सभी पुराने आदर्शों और सिद्धान्तों का बहिष्कार तथा समाज के दीर्घकालीन अनुभव तथा संचित ज्ञान का अनादर अनुचित होगा । हमारा कर्तव्य है कि हम अपनी संस्कृति का सतर्क और वैज्ञानिक अध्ययन १. प्रोफेसर श्रीमुकुटबिहारीलाल के ग्रन्थ “आचार्य नरेन्द्रदेव : युग और नेतृत्व" से साभार संकलित । २. “योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः" (१।२) इस योगसूत्र के अनुसार योगशास्त्र भी एक प्रकार से चित्तभूमि की खेती ही है ।