विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)
Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary
भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंआशीर्वचन सदियों से भारत जगत् का आध्यात्मिक गुरु रहा है। आज भी भारत से अन्य देशों में आध्यात्मिकता का प्रसार हो रहा है। भारत की आध्यात्मिकता परम्परागत है और सदा अबाधित रही है। इस परम्परा में तंत्रशास्त्र का विशिष्ट और सर्वोच्च स्थान है क्योंकि अध्यात्म के अन्तिम लक्ष्य के स्वरूप और अनुभव का ज्ञान तथा उसको प्राप्त कराने वाले उपायों और प्रक्रियाओं की जानकारी उसमें मिलती है। आजकल देश-विदेश में शांति और सत्य की खोज करने वाले लोगों में तंत्रशास्त्र के प्रति रुचि बढ़ रही है किन्तु दुर्भाग्य से इस महत्त्वपूर्ण शास्त्र को गलत समझकर कुछ व्यक्ति गुरु बन बैठे हैं, तंत्र सिखाते हैं और तंत्र के बारे में पुस्तकें भी लिखते हैं। इससे अध्यात्म-जगत् के जिज्ञासुओं की बड़ी हानि हो रही है। वे तंत्रशास्त्र के रहस्यमय यौगिक उपायों के सच्चे ज्ञान से वंचित हो रहे हैं। ऐसी स्थिति में तांत्रिक शैवदर्शन की योगपद्धति के वास्तविक स्वरूप को सम- झानेवाले प्रामाणिक एवं प्राचीन ग्रंथों का व्याख्या-सहित प्रकाशन अत्यन्त आवश्यक हो गया है। अतः यह अति आनन्द का विषय है कि शैवागम के दुर्लभ ग्रंथ 'विज्ञान भैरव' का हिन्दी-व्याख्या के साथ प्रकाशन हो रहा है। वस्तुतः कश्मीर के तन्त्र 'शैवागम' का दर्शन सर्वोत्कृष्ट है। उसके अनुसार यह सारा जगत् असत्य या मिथ्या नहीं है किन्तु चित्-शक्ति का ही विलास है। अतः यह चेतन है, शिव है, भैरव है और शिव-शक्ति का सामरस्य रूप परम तत्त्व है। चित्-शक्ति अपनी परम स्वतन्त्रता से अपने में से ही नानाविध जगत् की रचना करती है और उसमें अनु- स्यूत होकर रहती है। अतः जड़ और चेतन वही है, ग्राहक और ग्राह्य भी वही है। एक में से अनेक और अनेक में से एक होने की उसमें सामर्थ्य है। मानव में भी यही शक्ति निहित है किन्तु अन्तर में क्रियाशील न होने से वह इससे अनभिज्ञ है। इसी शक्ति को जगाना तन्त्रशास्त्र का उद्देश्य है। जब तक शक्ति जागृत नहीं होती है तब तक मानव 'शक्तिदरिद्रः संसारी' है। किन्तु अपनी शक्ति का विकास होते ही वह शिव ही बन जाता है। शक्ति जागृत करने के अनेक उपाय हैं। उनमें श्रेष्ठ उपाय 'गुरुकृपा' है। गुरु की कृपा से शक्ति का जागरण सरल हो जाता है और भैरव समावेश से व्यापक शिवावस्था प्राप्त होती है। यह मानव का अपना चिदात्म स्वरूप है। इस अवस्था में वह अनुभव कर लेता है कि गुरु और शिष्य, पूजक और पूज्य, साधक और साध्य, द्रष्टा और दृश्य वह स्वयं है और योग की अनेक अनुभूतियां सब कुछ एक परम शिव या भैरव ही हैं। इस प्रकार उसकी भेद में भी अभेद दृष्टि रहती है, जैसा कि 'विज्ञान-भैरव' में कहा गया है- 'ग्राह्यग्राहकसंवित्तिः सामान्या सर्वदेहिनाम् योगिनां तु विशेषोऽयं सम्बन्धे सावधानता।' Courtesy: Shri Tarun Dwivedi, Surviving Son of Late Vraj Vallabh Dvivediji (15 Jul 1926 - 17 Feb 2012)