विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)
Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary
भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 60, कुल 256 में से
संदर्भ में पढ़ेंविज्ञानभैरव : ३ वास्तविक स्वरूप को जान लेता है, तो वह आवागमन से छुटकारा पा जाता है और उसके लिये ईश्वर की पंचकृत्यकारिता समाप्त हो जाती है। आगम¹ या तन्त्रशास्त्र की अनेक शाखा-उपशाखाएँ हैं। प्रस्तुत ग्रन्थ 'विज्ञानभैरव' कश्मीर के प्रत्यभिज्ञा या त्रिक संप्रदाय से संबद्ध माना जाता है। तन्त्रालोक में अभिनवगुप्त ने तन्त्रशास्त्र को चार कोटियों में विभक्त किया है—²अनुपाय, शाम्भवोपाय, शाक्तोपाय और आणवोपाय । प्रत्यभिज्ञा या त्रिक दर्शन को उन्होंने अनुपाय कोटि में रखा है। सिद्ध-साहित्य में प्रचलित 'सहज' शब्द को हम अनुपाय शब्द का पर्याय मान सकते हैं। अनुपाय पद्धति से जिस परम तत्त्व का ज्ञान प्राप्त होता है, किसी यौगिक पद्धति का सहारा लिये बिना वहाँ तक पहुँचा नहीं जा सकता। अनुपाय शब्द का जयरथ³ ने 'अल्प उपाय' अर्थ किया है, क्योंकि पर्युदास स्थल में नञ् ⁴अल्पार्थक माना जाता है जैसा कि 'अनुदरा कन्या' इस प्रयोग में 'अनुदरा' शब्द का अर्थ 'पतली कमर वाली' होता है। जिस यौगिक प्रक्रिया के सहारे इस अनुपाय पद्धति से परम तत्त्व तक पहुँचा जा सकता है, विज्ञानभैरव में उसी का विस्तार से बड़ी गंभीरता से विवेचन किया गया है। इस तरह प्रस्तुत ग्रन्थ का प्रतिपाद्य विषय अनुपाय (सहज) योग है। अनुपाय दर्शन के द्वारा प्रतिपादित परम तत्त्व (विज्ञानभैरव) तक साधक को पहुँचा देना इसका प्रयोजन है। गुरु की कृपा, शास्त्र के अध्ययन और स्वयं अपनी प्रतिभा के सहारे परम तत्त्व के अन्वेषण में लगा हुआ व्यक्ति इस शास्त्र के अध्ययन का अधिकारी होगा और ये परस्पर प्रतिपाद्य-प्रतिपादक एवं प्रतिपत्ता के रूप में एक दूसरे से जुड़े हुए रहेंगे। प्रश्नोत्तरतत्त्वनिर्णय तन्त्रशास्त्र के प्रायः सभी ग्रन्थ प्रश्न-प्रतिवचन (उवाच) शैली में लिखे गये हैं। शैव और शाक्त तन्त्र शिव-पार्वती अथवा भैरव-भैरवी के संवाद अर्थात् प्रश्नोत्तर पद्धति में मिलते हैं। अद्वैतवादी शैव और शाक्त तन्त्रों में शिव और शक्ति का पृथक् अस्तित्व नहीं
- आगम और तन्त्रशास्त्र के स्वरूप, शाखा-उपशाखा आदि के विषय में लेखक ने पूना की वेदशास्त्रोत्तेजक सभा के शताब्दी ग्रन्थ 'प्राचीन भारतीय विद्येचे पुनर्दर्शन' में प्रकाशित 'आगम आणि तन्त्रशास्त्र' शीर्षक निबन्ध में विस्तार से प्रकाश डाला है। लुप्तागमसंग्रह के उपोद्घात का पूर्वार्ध भी देखिये।
- इन चारों उपायों के संबन्ध में उपोद्घात में विस्तार से विचार किया गया है।
- "पर्युदासस्य 'अनुदरा कन्या' इतिवदल्पार्थत्वेऽपि भावात् । (तथा च) अनुपायत्वम् (इत्यस्य) अल्पोपायत्वमित्यर्थः" (तन्त्र० वि० २।२; पृ० ३)।
- "नञ्भावे विषेधे च स्वरूपार्थेऽप्यतिक्रमे । ईषदर्थे च सादृश्ये तद्विकारतदन्ययोः ॥" मेदिनीकोश के इस श्लोक में आठ अर्थों में नञ् का प्रयोग बताया गया है। प्रस्तुत स्थल में ईषत् (अल्प) अर्थ में नञ् का प्रयोग हुआ है।
- 'विज्ञानभैरव' पद की व्याख्या एवं विश्लेषण उपोद्घात में देखना चाहिये। Courtesy: Shri Tarun Dwivedi, Surviving Son of Late Vraj Vallabh Dwivediji (15 Jul 1926 - 17 Feb 2012)