विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)
Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary
भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंविज्ञानभैरव : ५ दशा का उन्मेष होता है, जो कि प्रकाश और विमर्श के नाम से शास्त्रों में व्यवहृत है । इस प्रकार पश्यन्ती अवस्था में शास्त्रों का सूक्ष्म रूप से आविर्भाव होता है और मध्यमा एवं वैखरी अवस्था में आकर ये स्थूल रूप धारण कर लेते हैं । परा शक्ति पर भैरव से अभिन्न है, किन्तु अनुग्रह व्यापार में प्रवृत्त होकर जब यह पश्यन्ती भूमिका में प्रवेश करती है, तो लोक के कल्याण के लिए यह स्वयं प्रश्नकर्ता के रूप में उपस्थित होती है । उसको अपनी परा भूमि का सदा अपने आप भान होता रहता है, किन्तु वह आन्तर या बाह्य इन्द्रियों का विषय नहीं है, इसलिये यह उस परा वाणी को सदा परोक्ष मानती है । वह परा भूमि पश्यन्ती आदि से पहले विद्यमान है, अतः उसका भूतकाल में निर्देश माना जाता है । उस परा भूमि में दिन, मास आदि का संबन्ध न होने से अत्यन्त परोक्ष भूत काल का, जैसे वह आज भी विद्यमान है, इस तरह से भान होता है । लोक में 'सुप्तोऽहं किल विललाप' (मैं जब सोया हुआ था, तब प्रलाप कर रहा था) इस तरह से वर्तमान काल में भूत काल का प्रयोग होता है, उसी तरह से यहाँ वर्तमान काल की अनुस्यूति रहते हुए भी अवस्था की भिन्नता के आधार पर 'उवाच' इस भूत काल की क्रिया का प्रयोग उचित ही माना जायगा । इसका अभिप्राय यह है कि लोक में गाढ़ी नींद से जाग उठने पर व्यक्ति को उस बीती अवस्था का स्मरण नहीं रहता, क्योंकि वह उसके जाग्रत् अनुभव का विषय नहीं रही है । बाद में दूसरे व्यक्ति के कहने से तथा पूर्व अवस्था में की गई विलाप, गान आदि क्रियाओं के कारण उत्पन्न अपने शरीर के कम्प, हर्ष आदि विकारों को देख कर यह जान पाता है कि सोये हुए मैंने ऐसा किया था । इन अनुभूति का सर्वथा अपलाप नहीं किया जा सकता । मद, स्वप्न, मूर्छा प्रभृति अवस्थाओं में किसी विशेष वस्तु का ज्ञान न होने से उसको परोक्ष अनुभूति मान लिया जाता है । परावस्था में तो वेद्य (जानने योग्य) विषय का सर्वथा अभाव ही रहता है । इन दोनों ही स्थितियों में विषय की परोक्षता तो समान ही है, किन्तु अन्तर यह है कि मद आदि अवस्थाओं में अज्ञान से आवृत्त (छिपा) और परमेश्वर की तरह, प्रकाश और विमर्श की भी स्थिति यामल भाव में ही रहती है । ये सदा साथ रहते हैं । वस्तुतः शब्द-अर्थ, पार्वती-परमेश्वर और प्रकाश-विमर्श शब्द पर्यायवाची हैं । अर्धनारीश्वर रूप में भगवान् शिव जैसे सतत यामल भाव में रहते हैं, वैसे ही प्रारंभ में प्रकाश और विमर्श की स्थिति सामरस्य अवस्था में रहती है । इसी को समावेश दशा भी कहते हैं । समावेश दशा में जीव में परिमित प्रमाता का भाव गौण हो जाता है और वह अपने को स्वतन्त्र, बोधस्वरूप समझने लगता है, किन्तु शिव और शक्ति का यह समावेश (सामरस्य) प्रपंच के उन्मेष के लिये होता है । जीव जिस तरह शिवभाव में समाविष्ट होता है, उसी तरह से शिव और शक्ति का यामल भाव भी प्रपंच के रूप में समाविष्ट हो जाता है, प्रपंच के रूप में दिखाई देने लगता है ।