भारतकोश
विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)

विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)

Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary

भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished256 पृष्ठ

पृष्ठ 64, कुल 256 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 64

विज्ञानभैरव : ७ शिव संक्षेप में उसका समाधान करते हैं। इसके बाद 'देवदेव' से 'ब्रूहि भैरव' पर्यन्त श्लोकों में देवी शिव द्वारा प्रतिपादित परमतत्त्व की प्राप्ति का उपाय पूछती है और शिव इसके उत्तर में आगे के ग्रन्थ में ११२ धारणाओं का वर्णन करते हैं। इन धारणाओं के अभ्यास की फल- श्रुति सुन कर 'इदं यदि वपुर्देव' इत्यादि दो श्लोकों से देवी पुनः कुछ प्रश्न उठाती है और आगे के ग्रन्थ में शिव उनका भी समाधान प्रस्तुत करते हैं। अन्त के दो श्लोकों में देवी पूरी तरह से अपने संशय की निवृत्ति की बात स्वीकार करते हुए इस समाधान के प्राप्त परितृप्ति (प्रसन्नता) का वर्णन करती हैं और शिव के साथ तन्मय हो जाती हैं। इस प्रकार प्रश्न- प्रतिवचनात्मक इस पूरे ग्रन्थ का तात्पर्य वैखरी प्रभृति परा पर्यन्त वाणी के माध्यम से विज्ञानभैरव के साथ साधक की समावेश दशा की उपलब्धि में है। अर्थात् परा देवी के प्रश्नों का समाधान हो जाने पर जिस तरह से वह शिव के साथ तन्मय हो गई, उसी तरह से प्रत्येक साधक विज्ञानभैरव स्वरूप परम तत्त्व के साथ तादात्म्य लाभ कर सकता है, जब कि वह परा- वस्था तक पहुँच कर इस शास्त्र के रहस्य को ठीक समझ लेता है। इसलिए इस शास्त्र का नाम भी यही रख दिया गया है । इस शास्त्र के रचयिता स्वयं भैरव ही हैं। जब वे तिरोधान व्यापार में प्रवृत्त होते हैं तो सुख-दुःख, नील-पीत आदि नाना प्रकार के आन्तर और बाह्य विचित्र स्वरूपों और तदनुकूल चेष्टाओं से अपने स्वरूप को ढक लेते हैं और अनुग्रह व्यापार में प्रवृत्त होनेपर वे ही सूर्य से निकली किरणों की तरह अपने स्वरूप से बाहर निकले भक्त जनों पर अनुग्रह करने की दृष्टि से प्रश्नोत्तर शैली में शास्त्र की अवतारणा करते हैं। 'श्रुतं देव....परमेश्वर' इस श्लोक में विमर्शमयी भैरवी प्रकाशस्वरूप भैरव से पूछती है कि हे देव, १ अर्थात् विश्व को प्रकाशित करने जैसी क्रीड़ा करने वाले स्वात्मस्वरूप भगवन् ! समस्त रोगों को नष्ट करने वाले रुद्र और उसकी शक्ति के सामरस्य स्वरूप यामल से जिनकी उत्पत्ति हुई है, २ ऐसे समस्त शास्त्रों को मैंने सुन लिया है। ये शास्त्र त्रिक अर्थात् परा, परा- परा और अपरा शक्ति के सारभूत शिव, शक्ति और नर (जीव) नामक तीनों तत्त्वों के भेद से

  1. दिवादि गण में पठित 'दिवु क्रीडाविजिगीषाव्यवहारद्युतिस्तुतिमोदमदस्वप्नकान्तिगतिषु' इस धातु से 'पचाद्यच्' प्रत्यय होने पर देव शब्द बनता है। क्रीडा, विजिगीषा, व्यवहार, द्युति, स्तुति ओर गति शब्दों के साम्प्रदायिक अर्थ महार्थमंजरीपरिमल (पृ० १७३) में मिलते हैं।
  2. "अदृष्टविग्रहाच्छान्ताच्छिवात् परमकारणात् । ध्वनिरूपं विनिष्क्रान्तं शास्त्रं परम- दुर्लभम् ॥" यह श्लोक विज्ञानभैरवोद्योत (पृ० ३) और स्वच्छन्दोद्योत (१।३; पृ० ६) में उद्धृत है। कुछ पाठ भेदों के साथ यह स्वच्छन्दतन्त्र (८।२७-२८), श्रीकण्ठीयसंहिता (स्वच्छन्दोद्योत, वहीं, पृ० १९) और पौष्करागम (श० २० सं०, पृ० ७) में उपलब्ध होता है। इन स्थलों में शास्त्रों की नादरूपता का प्रतिपादन मिलता है। इस विषय की विशद जानकारी के लिये लु० सं० उपोद्घात (पृ० ११२-११३) देखिये।