विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)
Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary
भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१४ : विज्ञानभैरव को छोड़कर आप किसी एक निर्णीत वास्तविक स्वरूप को मुझे समझाइये कि स्वप्रकाश प्रमातृतत्त्व वस्तुतः क्या है ? इसकी प्राप्ति के लिए परावस्था की ओर उन्मुखता का त्याग करना पड़ता है या प्रमेय स्वरूप का ? अथवा समस्त प्रमाताओं के साथ अहमात्मक स्वात्मस्वरूप की भावना करनी पड़ती है ? इन सब प्रश्नों का समाधान मिलने पर ही समस्त जागतिक पदार्थों के स्वात्मस्वरूप से अतिरिक्त न होने के कारण अभेद-प्रतीति के आधार पर 'अहम्' इस स्वात्मस्वरूप में ही सारे जागतिक पदार्थों की विश्रान्ति हो जाने से यह सब मेरा ही स्वरूप है, इस तरह का निर्णय करने में मैं समर्थ हो सकूँगो ।। श्रीभैरव उवाच साधु साधु त्वया पृष्टं तन्त्रसारमिदं प्रिये ॥७॥ गूहनीयतमं भद्रे तथापि कथयामि ते । हे प्रिये, अत एव भद्रे कल्याणिनि, यत् त्वया तन्त्रसारं सर्वशास्त्रसारभूतम् इदं वस्तु पृष्टं तदतीव शोभनम्। प्रश्नचयस्यास्य परमेष्टत्वात् पुनरुक्त्या 'साधु साधु' इति निर्देशः । यत् त्वया तन्त्राणां सर्वशास्त्रनिचयानां सारं पृष्टं तद् अतिरहस्यत्वाद् गूहनीय- तममपि ते योग्यायास्तव समक्षं कथयामि, यतो हि मे विश्वासो वर्तते यत् त्वं गूहनीय- तममिदं वस्तु स्वात्मनि अभेदेन ध्यानार्थमेव पृच्छसि, न तु तस्य वाचा वैखर्या प्रकाश- नार्थमिति भावः ॥७॥ 'भैरवी उवाच' वाक्य की व्याख्या करते समय पहले बताया गया है कि स्वयं सदाशिव शिव और शक्ति के रूप में गुरु और शिष्य बनकर प्रश्न और प्रतिवचन की पद्धति से शास्त्रों की अवतारणा करते हैं । यद्यपि इन प्रश्नों के माध्यम से उठे संदेह को संविद्देवी स्वयं अपनी विचार शक्ति से ही दूर कर सकती है, प्रायः सभी लोगों के व्यवहार में इस प्रकार की स्थिति आती है कि वह स्वयं अपने मन में शंका उठाता है और स्वयं अपने ही उसका समाधान भी खोज लेता है, तथापि उक्त शास्त्रीय पद्धति के अनुसार स्वभाव-स्वरूपिणी देवी भैरवभाव को प्राप्त कर उक्त प्रश्नों का उत्तर देती है । अर्थात् इस तरह से अपने से अभिन्न संविद्देवी के शिष्य रूप में अवतरित हो तत्त्वविषयक प्रश्नों के पूछे जाने पर निर्णायक के पद पर बैठकर स्वयं परमेश्वर 'भैरव उवाच' इत्यादि से सिद्धान्त का उपदेश करते हैं । भैरवां ने जो कुछ पूछा, उसके लिये उसकी प्रतिभा की प्रशंसा करते हुए भैरव कहते हैं कि हे प्रिये, परानन्द से प्राप्त होने वाली तृप्ति की प्रसिद्धि में तत्पर, अत एव सबका कल्याण करने वाली हे देवि, यह तुमने बहुत अच्छे प्रश्न पूछे है। इस तरह के प्रश्न भैरव को बहुत प्रिय हैं, अतः यहाँ 'साधु' शब्द की पुनरुक्ति (साधु साधु) की गई है । सब शास्त्रों की सारभूत यह बात अत्यन्त गोपनीय है । ऐसा होने पर भी इस गोपनीय रहस्य को तुम्हें मैं इसलिये बताता हूँ कि तुम में अनुत्तम पद में एकाकार (समाविष्ट) होने की उन्मुखता के कारण इस रहस्य को जानने की योग्यता विद्यमान है । इस रहस्य को बहुत छिपा कर रखना चाहिये । उसको अपने पेट में ही रखना चाहिये और उस पर विचार, ध्यान, मनन आदि चलाते रहना चाहिये । Courtesy: Shri Tarun Dwivedi, Surviving Son of Late Vraj Vallabh Dwivediji (15 Jul 1926 - 17 Feb 2012)