भारतकोश
विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)

विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)

Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary

भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished256 पृष्ठ

पृष्ठ 75, कुल 256 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 75

१८ : विज्ञानभैरव ¹अन्तःस्वानुभवानन्दा विकल्पोन्मुक्तगोचरा । याऽवस्था भरिताकारा भैरवी भैरवात्मनः ॥१५॥ तद्वपुस्तत्त्वतो ज्ञेयं विमलं विश्वपूरणम् । परभैरवस्यास्य परावस्था पूर्वापरादिक्षु वर्तमानादिकालेषु च कलनातीता, देशेन दूरासन्नादिना ²उद्देशेन च इदन्तानिर्देश्येन न विद्यते विशेषो यस्यास्तादृशी देशादेशाविशेषिणी च विद्यते । अत एव परमार्थतो व्यपदेष्टुमुपदेष्टुमशक्या मध्यमा- जल्पाविषया, अभिधित्सागोचरत्वाभावादकथ्या वैखर्याऽप्यव्यावर्णनीया । अन्तःस्वानु- भवानन्दा अन्तरिति पूर्णाहन्तायां स्वानुभवः स्वप्रकाश आनन्द एव रूपं यस्यास्तादृशी स्वप्रकाशैकस्वरूपा । विकल्पोन्मुक्तगोचरा निर्विकल्पपरमार्था च पूर्णस्वरूपस्य भैरवस्य या भरिताकाराऽवस्था भरितोऽशेषविश्वभेदचमत्कारमय आकारः स्वरूपं यस्याः सा तादृशी, अहमिति विश्रान्तिमयी भैरवी, तदेव तत्त्वतः परमार्थतो विमलं स्वात्मभित्त्या- भासितजगदनाच्छादितं विश्वपूरणमशेषावभासकं वपुः स्वरूपं ज्ञेयम्, न त्वन्यदाकृत्यादि ॥१४-१५॥ यदि ऊपर बताया गया स्वरूप सकल है, तो उस निष्कल स्वरूप को भी आप बताइये, जिससे कि मेरा परा शक्ति सम्बन्धी संशय भी दूर हो सके ? देवी के इसी संशय को दूर करने के अभिप्राय से भैरव कहते हैं कि पर भैरव की यह परावस्था पूर्व-पश्चिम प्रभृति सभी दिशाओं में और वर्तमान आदि सभी कालों में कलना से शून्य है; दूर, आसन्न (निकट) आदि देश और इसका यह नाम है, इस तरह के उद्देश (व्यवहार) से इसमें किसी विशेषता का आधान नहीं हो पाता, देश और काल आदि विशेषणों से सीमित करके उसको बताया नहीं जा सकता । वस्तुतः इसके स्वरूप को समझा पाना इसलिये कठिन है कि न तो इसका मध्यमा वाणी में ही स्फुरण होता है और न वैखरी वाणी से ही इसका वर्णन किया जा सकता है । अर्थात् दिशा, काल, देश, नाम, रूप आदि से परिच्छिन्न न होने से इस परावस्था के स्वरूप को वाणी के माध्यम से समझा पाना बड़ा कठिन है । इसका अनुभव तो पूर्णाहन्ता का विकास होने पर अपने भीतर अपने आप प्रकाशित हो रहे आनन्द के रूप में होता है । इसका यह स्वरूप सभी तरह की कल्पनाओं से, नाम-रूप, क्षणिकता आदि उपाधियों से रहित होने से निर्विकल्प अत एव वास्तविक है । पूर्णस्वरूप बोध-भैरव की यह अवस्था सारे विश्व में अहमाकार में सर्वत्र भरी हुई है, व्याप्त है । वस्तुतः यही विमल (निर्मल), अर्थात् स्वात्मभित्ति में आभासित हो रहे जगत् के दोषों से अनाच्छादित (असंयुक्त) रह कर विश्व का पूरक, अर्थात् सारे जगत् का प्रकाशक, निष्कल स्वरूप उस परावस्था में प्रकट होता है । इससे भिन्न इसकी कोई आकृति नहीं मानी जाती ॥१४-१५॥

  1. शिवसूत्रविमर्शिनी (पृ० ६३) में 'अन्तःस्वानु०' इत्यादि तीन पंक्तियाँ उद्धृत हैं ।
  2. "तत्र नामधेयेन पदार्थमात्रस्याभिधानमुद्देशः" (न्या० भा० १।१।३) ।