भारतकोश
विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)

विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)

Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary

भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished256 पृष्ठ

पृष्ठ 83, कुल 256 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 83

२६ : विज्ञानभैरव इस तरह से प्राण और जीव पद से यहाँ अकारादि सकारान्त मातृका के वर्णों का बोध होता है। विसर्ग स्वभाव के अपने एक भाग में हकार कला को धारण करने वाली नाद रूपा यह परा देवी मातृका चक्र के क्रम से समस्त वाच्य-वाचकात्मक जगत् को लांघ कर, अपने प्रकाश से समस्त भेद दृष्टि को दबाकर स्फुरित होती है। इस लिये उक्त दोनों उत्पत्ति स्थानों में, हृदय और द्वादशान्त में, अकार और हकार का परामर्श करने से शिव और शक्ति का साम- रस्य हो जाने पर साधक भैरव-स्वरूप में समाविष्ट हो जाता है। 'ऊर्ध्व' पद का अर्थ है उत्कृष्ट प्राण, क्योंकि इच्छा, ज्ञान और क्रिया शक्ति का इसी में विस्तार होता है और उसी से यह सारा विश्व अनुप्राणित है। 'अधः' पद का अर्थ है इदन्ता परामर्श का विषय होकर निकृष्ट दशा को प्राप्त हुआ जीव, क्योंकि इच्छा के विषय ज्ञेय वर्ग का यह कार्य बन जाता है। सोमरूप आप्यायक शक्ति संसारी जीवों की स्थिति का कारण बनती है। यह शक्ति परा, परापरा और अपरा शक्तियों के रूप में स्फुरित होती हुई विश्व से अभिन्न रूप में सदा भासित होती रहती है। इस लिये उत्पत्ति स्थल अर्थात् प्रमेय पद में, द्वितय शब्द वाच्य प्रकाश्य-प्रकाशक के सामरस्य रूप प्रमाण पद में तथा प्रमेय¹ और प्रमाण की जहाँ विश्रान्ति होती है, उस प्रमातृ पद में भरण से अर्थात् परा भट्टारिका स्वरूप तुरीय में आनन्द से आप्यायित हो जाने से साधक में भैरव दशा की अभि- व्यक्ति हो जाती है। अथवा ऊर्ध्व पद का अर्थ है माया पर्यन्त अध्वा के ऊपर, प्राण का अर्थ है इनका अनु- प्राणक शुद्ध और अशुद्ध अध्वा में व्याप्त शिव-शक्ति तत्त्व। इसके नीचे जीव की स्थिति है, जिसने कि माया प्रभृति तत्त्वों की अधीनता स्वीकार कर ली है और मनुष्य नाम से अभिहित होता है। यही आत्मतत्त्व कहलाता है। इन सब स्वरूपों में शिव की परात्मिका स्वातन्त्र्य शक्ति ही स्पन्दित होती रहती है। उत्पद्यमान शुद्ध और अशुद्ध दोनों मार्गों में पर शक्ति की इस व्याप्ति के कारण ही सब सब कुछ है, इस भावना के अभ्यास से जगत् के समस्त पदार्थों के साथ सामरस्य की स्थिति प्राप्त हो जाने पर साधक को भरितावस्था प्राप्त हो जाती है। अन्तिम अर्थ यह है—अनुत्तर, अकुल स्वरूप चिद्धाम से स्वयं उन्मिषित होने वाले हकार की स्थिति ऊपर और नीचे विसर्जनीय अनुप्राणित विसर्गस्वरूप जीव की, सकार की स्थिति रहती है। हान और समादान, त्याग और ग्रहण की प्रक्रिया के आधार पर इस हंस

  1. "त्रिषु चतुर्थं तैलवदासेच्यम्" (३।२०) इस शिवसूत्र में प्रमाता, प्रमाण और प्रमेय दशाओं में तथा जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति अवस्थाओं में चतुर्थ शिवपद (शुद्ध प्रमाता) तथा तुरीय अवस्था के आसेचन की बात कही गई है। जल पर तेल गिराने से जैसे वह चारों तरफ फैल जाता है, उसी तरह से उक्त तीनों स्थितियों में चतुर्थ दशा का आसे- चन करने से (फैला देने से) साधक शिव-स्वरूप का, तुरीय अवस्था का सभी स्थानों और अवस्थाओं में साक्षात्कार करने लगता है।