विक्रमाङ्कदेवचरितम् (कल्याणी चालुक्य साम्राज्य इतिहास - सटीक)
Vikramankadeva Charitam of Bilhana with Commentary
महाकवि बिल्हण / पं. विश्वनाथ शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ४३७ ) इस प्रकार बालक बसन्त ने वन में की सभी वस्तुओं से क्रीडा करते हुए क्या नहीं किया। अर्थात् बालक बसन्त ने कर्तव्याकर्तव्य का विचार छोड़कर अपनी इच्छा के अनुसार सब कुछ खेल किया। जैसे कोई बालक वृक्षारोहण, धूर में लोटना और मा के या अन्य स्त्रियों की साडी खींचना आदि चेष्टाएं करता है वैसे ही चैत्र ने किया। भाव यह है कि वसन्त ऋतु के आने से वृक्षों पर वासन्तिक शोभा छा गई, पुष्पों के समूह से खूब मकरन्द चूने लगा और लताओं में से फूल टूट २ कर गिरने लगे। दक्षः प्रवालौष्ठसमर्पणाय लतावधूनां मुकुलस्तनीनाम्। मत्तालिवैतालिकगीतकीर्तिर्भ्रमन्मधुर्यौवनमारुरोह ॥३८॥ अन्वयः मुकुलस्तनीनां लतावधूनां प्रवालौष्ठसमर्पणाय दक्षः मत्तालिवैतालिक- गीतकीर्तिः भ्रमन् मधुः यौवनम् आरुरोह। व्याख्या मुकुलानि कुड्मलान्येव स्तनाः कुचा यासां तास्तासां लतावधूनां वीरुद्रूपनारीणां प्रवाला. रक्तकिसलया एवौष्ठा अधरोष्ठास्तेषां समर्पणाय वितरणाय दक्षश्चतुरः प्रगल्भ इत्यर्थः। मत्ता मदान्धा अलयो भ्रमरा एव वैतालिकाः स्तुतिगायका- स्तैर्गीता गानेन वर्णिता कीर्तिर्यस्य स भ्रमंस्ततस्ततो गतागतं कुर्वन् मधुर्वसन्तो यौवनं तारुण्यमारुरोह सम्प्राप्तवान् । प्रत्यग्रकुचभूषितानां किशोरीणाम- धरोष्ठप्रदाने चुम्बनदाने कुशलो वैतालिकगीतकीर्तिस्सञ्चरन् मनुष्य इव मुकुलि- तानां लतानां किसलयप्रदाने कुशलो मत्तालिगीतकीर्तिर्भ्रमन् वसन्तो यौवनं प्रापेति भावः। भाषा कली रूपी स्तनों वाली, लता रूपी स्त्रियों को किसलय (नये लाल पत्ते) रूपी ओठों को (तृप्त करने में) देने में कुशल मदोन्मत्त भ्रमर रूपी स्तुतिगायकों से गाई गई कीर्तिवाला, चारों ओर विहरण करने वाला वसन्तऋतु युवावस्था को प्राप्त हुआ। अर्थात् छोटे २ नये कड़े स्तन वाली किशोरियों के लाल ओठों को चूम लेने में कुशल स्तुतिपाठकों द्वारा कीर्तिगान किए जाने वाले नवयुवक के