विक्रमाङ्कदेवचरितम् (कल्याणी चालुक्य साम्राज्य इतिहास - सटीक)
Vikramankadeva Charitam of Bilhana with Commentary
महाकवि बिल्हण / पं. विश्वनाथ शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( २९ ) भाषा वृद्धावस्था के कारण रात्रि रूपी कामिनी के चन्द्ररूपी मस्तक को लटका हुआ देखकर चन्द्र के अस्तोन्मुख होने से और उसकी (रात्रि की) वृद्धावस्था की बुरी हालत से प्रसन्न होकर कमलिनी मानो उसे चिढाने के लिये मुस्कुराने लगी। अर्थात् रात समाप्त होने से और चन्द्रमा के अस्तोन्मुख होने के कारण नीचे लटक जाने से कमलिनी धीरे २ खिलने लगी। कमलिनी रात को नही खिलती यह बात प्रसिद्ध है। ज्ञात्वा विधातुश्चुलुकात्प्रसूतिं तेजस्विनोऽन्यस्य समस्तजेतुः । प्राणेश्वरः पङ्कजिनीवधूनां पूर्वाचलं दुर्गमिवारुरोह ॥३७॥ अन्वयः पङ्कजिनीवधूनां प्राणेश्वरः विधातुः चुलुकात् समस्तजेतुः अन्यस्य तेज- स्विनः प्रसूतिं ज्ञात्वा इव दुर्गं पूर्वाचलम् आरुरोह। व्याख्या पङ्कजिन्यो नलिन्यस्त एव वध्वस्तासां प्राणेश्वरो जीवितेश्वरस्तरणिर्विधातु- र्ब्रह्मणश्चुलुकाञ्जलपूरिताञ्जलेः समस्तस्य राजवंशस्य जेतुर्जयशीलस्यान्यस्य कस्यचित्तेजस्विनः प्रतापिनश्चालुक्यवंशमूलपुरुषस्य प्रसूतिमुत्पत्तिं ज्ञात्वेव विज्ञा- यैव सकलजेतुरन्यतेजस्विनो भयादात्मरक्षार्थं दुर्गं दुष्प्राप्यस्थानं दुर्गाश्रयं वा पूर्वाचलमुदयाचलमारुरोह गतवानिति । सूर्योदयो जात इति भावः । अत्र पद्मिन्यां वधूतादात्म्यारोपः सूर्ये प्राणेश्वरस्याऽभेदारोपे कारणत्वात्परम्परितं रूपकम्। पूर्वाचले दुर्गाभेदरूपकम् । सूर्यस्य दुर्गारोह अन्यतेजस्विन उत्पत्ति- ज्ञानस्य कारणत्वेनोत्प्रेक्षणादुत्प्रेक्षा । सूर्यवृत्तान्ते तादृशाप्रकृतान्यपुरुषवृत्तान्ता- भेदसमारोपात्समासोक्तिः । अत एतेषां सङ्करः । भाषा ब्रह्मा के चुल्लू से सबको जीतने वाले चालुक्य वंश के मूल पुरुष रूपी किसी दूसरे तेजस्वी की उत्पत्ति होने वाली है ऐसा मानो जानकर कमलिनी रूपी ललनाओ के पति सूर्य भय से पूर्वाचल रूपी अगम्य किले पर चढ गये। अर्थात् जिस प्रकार प्रतापी, वीर और सबको जीतने वाले योद्धा के आने पर कोई प्रतापी भय से दुर्गाश्रय कर लेता है उसी प्रकार चालुक्य वंश के प्रतापी मूल पुरुष की ब्रह्मा जी के चुल्लू से उत्पत्ति होने वाली है ऐसा मानो जान कर