विक्रमाङ्कदेवचरितम् (कल्याणी चालुक्य साम्राज्य इतिहास - सटीक)
Vikramankadeva Charitam of Bilhana with Commentary
महाकवि बिल्हण / पं. विश्वनाथ शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ६७ ) भाषा जिस आहवमल्लदेव राजा के चरित्र को, पवित्र अतएव निष्कलङ्क होने से महाकवियों ने दूसरे दशरथ के पुत्र राम के समान आख्यायिका, अद्भुत कथा, महाकाव्य और नाटकादि दस रूपकों में ग्रथित किया था। अर्थात् जैसे रामचन्द्र का चरित्र महाकवियों ने विभिन्न प्रकार के काव्यों में वर्णित किया है वैसे ही इसका भी चरित्र महाकवियों ने विभिन्न प्रकार के काव्यों में वर्णित किया था। भूपेषु कूपेष्विव रिक्त-भावं कृत्वा प्रपापालिकयेव यस्य । वीरश्रिया कीर्तिसुधारसस्य दिशां मुखानि प्रणयीकृतानि ॥८६॥ अन्वयः यस्य प्रपापालिकया इव वीरश्रिया कूपेषु इव भूपेषु कीर्तिसुधारसस्य रिक्तभावं कृत्वा दिशां मुखानि प्रणयीकृतानि । व्याख्या यस्य - राज्ञ आहवमल्लदेवस्य प्रपा पानीयपालिका 'प्रपा पानीयपालिका' इत्यमरः । तस्याः पालिकयेव जलप्रदानरतया नार्यैव वीरश्रिया धीरलक्ष्म्या कूपेष्विव भूपेषु राजसु कीर्तियशः सुधारस इवामृतरस इव तस्य रिक्तभावं शून्यत्वं विधाय कृत्वा दिशा मुखानि प्रणयीकृतानि स्नेहार्द्रीकृतानि । यथा प्रपापालिका कूपस्थसम्पूर्णजल सर्वदिक्स्थजनान् पाययित्वा तेषां मुखानि प्रसादयति, कूपानि च जलरहितानि करोति तथैव वीरश्रीः सर्वान् विपक्ष-भूपान् कीर्तिशून्यान् विधायाऽस्य कीर्त्या सर्वा दिशो धवलयतिस्म तत्स्थाञ्जनानाऽऽनन्दयतिस्मेतिभावः । वीरलक्ष्म्याः प्रपापालिकासादृश्याद्भूपेषु कूपसादृश्याच्चोपमा । दिगन्त-विश्रान्त- यशा असौ वीर इति भावः । भाषा जिस राजा आहवमल्लदेव की वीरश्री ने पोसरा चलाने वाली स्त्री के समान कूपों के समान भूपों में से अमृत जल के समान यश को निकालते २ उन्हें खाली कर पोसरे पर पानी पीने वालों के मुखों के समान सब दिशाओं के मनुष्यों के मुखों को प्रसन्न कर दिया। अर्थात् आहवमल्लदेव ने वीरता से