भारतकोश
विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 157

१४६ विनय-पत्रिका राम सुमिरन सब विधि ही को राज रे । राम को बिसरिबो निषेध-सिरताज रे ॥२॥ राम-नाम महामनि, फनि जग-जाल रे । मनि लिये फनि जियै ब्याकुल बिहाल रे ॥३॥ राम-नाम कामतरु देत फल चारि रे । कहत पुरान, बेद, पंडित, पुरारि रे ॥४॥ राम-नाम प्रेम-परमारथ को सार रे । राम-नाम तुलसी को जीवन-अधार रे ॥५॥ शब्दार्थ-सानुराग = प्रेम-सहित। फनि = साँप। जग-जाल = जगत्-प्रपंच। कामतरु = कल्पवृक्ष। भावार्थ-हे जीव ! प्रेमके साथ राम राम जपा कर। कलियुगमें न तो वैराग्य ही है, और न योग, यज्ञ, तप एवं त्याग ही (अर्थात् ये सफल नहीं हो सकते) ॥१॥ राम-नामका स्मरण करना सब विधि-कर्मोंमें श्रेष्ठ है और उसे भुला देना निषेध-कर्मोंमें सिरमौर है ॥२॥ राम-नाम महामणि है और जगजाल सर्प है। सर्पकी मणि ले लेनेपर क्या वह व्याकुल और विहाल सर्प जीवित रह सकता है ? (कदापि नहीं) तात्पर्य यह कि जिस प्रकार मणि ले लेनेपर सर्प मर जाता है, उसी प्रकार राम-नामरूपी मणि अपना लेनेसे सांसारिक कष्टरूपी सर्प मृतवत् हो जाता है ॥३॥ रामका नाम चारों फल देनेवाला कल्पवृक्ष है; सारांश, कल्पवृक्ष केवल अर्थ, धर्म और काम तीन ही फल देता है—मोक्ष नहीं देता; पर राम-नाम-रूपी कल्पतरु चारों फल देता है; इस बातको वेद, पुराण, पण्डित और शिवजी कहते हैं ॥४॥ राम-नाम, प्रेम यानी भक्ति और परमार्थका सार है। राम-नाम ही तुलसीदास के जीवनका आधार ॥५॥ विशेष १—'विधि'—शास्त्रोंमें विधि और निषेध दो तरहका कर्म बतलाया गया है; उन्हीं दोनों कर्मोंकी यहाँ चर्चा की गयी है। २—'जीवन अधार'—रामका नाम ही तुलसीदासके जीवनका आधार है।