भारतकोश
विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 159

१४८ विनय-पत्रिका कौन है अथवा कौन होगा ? बस, जैसे मछलीके लिए जल ही आधार है, उसी प्रकार तुझे केवल राम-नामका ही भरोसा है ॥५॥ विशेष १—'तिलोक तिहूँकाल'—पर गुसाईंजीने कहा है:— चहुँ जुग तीन काल तिहुँ लोका । भये नाम जपि जीव बिसोका ॥ बेद पुरान संत मत एहू । सकल सुकृत फल राम-सनेहू ॥ ( ६९ ) सुमिरु सनेह सों तू नाम रामराय को। संबल निसंबल को, सखा असहाय को ॥१॥ भाग है अभागेहू को, गुन गुनहीन को। गाहक गरीब को, दयालु दानि दीन को ॥२॥ कुल अकुलीन को, सुन्यो है बेद साखि है। पाँगुरे को हाथ-पाँय, आँधरे को आँखि है ॥३॥ माय बाप भूखे को, अधार निराधार को। सेतु भव-सागर को, हेतु सुखसार को ॥४॥ पतित पावन राम-नाम सो न दूसरो। सुमिरि सुभूमि भयो तुलसी सो ऊसरो ॥५॥ शब्दार्थ—अकुलीन = कुलहीन, नीच कुलवाला। पाँगुरे = पंगु, लँगड़े-लूले। सुखसार = सुखका सार, ब्रह्मानन्द। सुभूमि = सुन्दर भूमि, उपजाऊ भूमि। ऊसरो = ऊसर। भावार्थ—हे जीव ! तू स्नेहसे महाराज रामचन्द्रजीके नामका स्मरण कर। उनका नाम (भक्ति-मार्गपर जानेवालोंमें) जिनके पास मार्गव्यय नहीं है, उनके लिए मार्गव्यय या सहारा है और असहायका सखा है ॥१॥ राम-नाम अभागेका भाग्य और मूर्खोंका गुण है, वह गरीबका ग्राहक और दीनोंके लिए दयालु दानी है ॥ २ ॥ वह अकुलीनका कुल है, यह मैंने सुना है और वेद भी इस बातके साक्षी हैं। वह लँगड़े-लूलेका हाथ-पैर तथा अन्धोंकी आँख है ॥३॥ राम-नाम भूखोंका माई-बाप, निराधारका आधार, भवसागरका पुल और ब्रह्मानन्दका