विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३१० विनय-पत्रिका गीधको कियो सराध, भीलनी को खायो फल, सोऊ साधु-सभा भली भाँति भनियत है। रावरे आदरे लोक वेद हूँ आदरियत, जोग ग्यान हूँ ते गरु गनियत है ॥२॥ प्रभुकी कृपा कृपालु ! कठिन कलि हूँ काल, महिमा समुझि उर अनियत है। तुलसी पराये बस भये रस अनरस, दीनबन्धु ! द्वारे हठ ठनियत है ॥३॥ शब्दार्थ—नीके = अच्छी तरह । भनियत है = कही जाती है । गरु = भारी । भावार्थ—हे रामजी ! आप प्रीतिकी रीति अच्छी तरह जानते हैं। बलि- हारी ! वेद आपकी विरुदावलीको इस प्रकार मानते हैं कि आप बड़ेका बड़प्पन और छोटेका छोटापन दूर कर देते हैं। अर्थात् आप बड़ोंके अभिमानको कुचल- कर उसे धूलमें मिला देते हैं और दीन भक्तोंको अपनी कृपादृष्टि फेरकर श्रेष्ठ बना देते हैं ॥१॥ आपने गीधका श्राद्ध किया और शबरीके फल खाये, यह बात भी साधु-सभामें अच्छी तरह बखानी जाती है। जिसका आप आदर करते हैं, वह लोक और वेद दोनोंमें आदरणीय हो जाता है। आपका आदर करना, योग और ज्ञानसे भी अधिक वजनदार समझा जाता है ॥२॥ हे प्रभो ! आपकी कृपा बड़ी कृपालु है। उसकी महिमा समझकर इस कठिन कलिकालमें भी उसे अपने हृदयमें लाता हूँ । यदि तुलसी दूसरोंके वशमें हो जायगा तो सब रस फीका पड़ जायगा—रंगमें भङ्ग पड़ जायगी। इसीसे हे दीनबन्धु ! वह (और किसीके अधीन न होकर) आपहीके द्वारपर हठ ठाने पड़ा है ॥३॥ विशेष १—'गीध'—८३ वें पदके विशेषमें देखिये । २—'भीलनी'—शबरी; १०६ वें पदके विशेषमें देखिये । ३—'तुलसी······ठनियत है'—इसका यह अर्थ भी हो सकता है— “यद्यपि तुलसी दूसरोंके (विषयों या इन्द्रियोंके) वशमें होनेके कारण आपके