भारतकोश
विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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विनय-पत्रिका ३३१ राग भैरवी [ १९८ ] मन पछितैहै अवसर बीते । दुरलभ देह पाइ हरिपद भजु, करम, बचन अरु ही ते ॥१॥ सहसबाहु, दसबदन आदि नृप बचे न काल बली ते । हम-हम करि धन-धाम सँवारे, अन्त चले उठि रीते ॥२॥ सुत-बनितादि जानि स्वारथरत, न करु नेह सबही ते । अन्तहुँ तोहिं तजैंगे पामर ! तू न तजै अबही ते ॥३॥ अब नाथहिं अनुराग, जागु जड़, त्यागु दुरासा जी ते । बुझै न काम-अगिनि तुलसी कहुँ विषय-भोग बहु घी ते ॥४॥ शब्दार्थ—ही = हृदय, मन । धाम = घर । रीते = खाली हाथ । पामर = नीच । भावार्थ—रे मन ! अवसर बीत जानेपर तुझे पछताना पड़ेगा । दुर्लभ मनुष्य-शरीर पाकर कर्म, वचन और हृदयसे भगवान्‌के चरणोंका भजन कर॥१॥ सहस्रबाहु और रावण आदि (महा तेजस्वी) राजा भी बलवान कालसे नहीं बचे, जो 'हम-हम' करते हुए धन-धाम सँभालनेमें लगे रहे; पर अन्तमें खाली हाथ (इस संसारसे) उठकर चले गये ॥२॥ पुत्र, स्त्री आदिको स्वार्थरत जानकर इन सबसे स्नेह न कर । रे नीच ! ये सब तुझे अन्तमें छोड़ देंगे; इसलिए तू अभीसे इन्हें क्यों नहीं छोड़ देता ? ॥३॥ रे मूर्ख ! अब जाग, सारी दुराशाओंको हृदयसे छोड़ दे, और भगवान्‌से प्रेम कर । रे तुलसी ! भला कहीं कामरूपी अग्नि विषय-भोगरूपी बहुत-सा घी डालनेसे बुझती है ? ॥४॥ विशेष १—'अन्त चले'—इसपर कबीरदासके शब्दोंका भी रसास्वादन कर लीजिये:— जियरा जाहुगे हम जानी ॥ राज करंते राजा जैहैं रूप करंते रानी । चाँद भी जैहै सूरज भी जैहै, जैहै पवन औ पानी ॥