विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविनय-पत्रिका ४२१ प्रीति करि काहूने सुख न लह्यो । अलिसुत प्रीति करी जलसुत सों सम्पुट माँहिं रह्यो ॥ प्रीति पतंग करीजु दीपक सों आपुन प्रान दह्यो । सारँग प्रीति करीजु नाद सों सनमुख बान सह्यो ॥ हम जो प्रीति करी माधव सों चलत कछू ना कह्यो । सूरदास प्रभु तुम्हरे दरस बिनु नैनन नीर बह्यो ॥ २—'सोई नर खरु है'—ईश्वर-विमुख प्राणीको गधेकी उपाधि देना मामूली बात है । श्रीमद्भागवतमें तो यह लिखा है:— श्वविड्वराहोष्ट्रखरैः संस्तुतः पुरुषः पशुः । न यत्कर्णपथोपेतो जातुनाम गदाग्रजः ॥ बिले बतोरुक्रमविक्रमान्ये नशृण्वतः कर्णपुटे नरस्य । जिह्वासती दार्दुरिकेव सूत न चोपगायत्युरुगायगाथाः ॥ (२।३।१९-२०) अर्थात् 'जिसके कर्णपथमें भगवान्के नाम-गुणोंने कभी प्रवेश नहीं किया, वह मनुष्यरूपी पशु कुत्ते, विष्ठाभोजी सूअर, ऊँट और गधेकी अपेक्षा भी अधिक निन्दनीय है। हे सूतजी ! जो कान भगवान्की लीलाका श्रवण नहीं करते वे साँपकी बिलके समान हैं और जो दुष्ट जिह्वा भगवान्की लीला-कथाका गान नहीं करती वह मेढककी जीभके समान व्यर्थ बकवाद करनेवाली है । इस श्लोकका अनुवाद गोस्वामीजीने रामचरितमानसमें इस प्रकार किया है— जिन्ह हरिकथा सुनी नहिं काना । श्रवनरन्ध्र अहि-भवन समाना ॥ जो नहिं करहि राम-गुन-गाना । जीह सो दादुर-जीह समाना ॥ ३—'नाम सों निबाह......बरु है'--इसका अर्थ वियोगी हरिजीने लिखा है—बलिहारी—तुलसीदासको वही बड़ा बल दीजिये, जिससे आपके नामके