विष्णु पुराण

विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished558 पृष्ठ
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अ० १९ ] * प्रथम अंश * ९५
| एतच्चान्यच्च सकलमधीतं भवता यथा ।<br>तथा मे कथ्यतां ज्ञातुं तवेच्छामि मनोगतम् ॥ ३२ | यह सब तथा और भी जो कुछ तूने पढ़ा हो वह सब मुझे सुना, मैं तेरे मनके भावोंको जाननेके लिये बहुत उत्सुक हूँ॥ ३२॥ |
| श्रीपराशर उवाच | **श्रीपराशरजी बोले—**तब विनयभूषण प्रह्लादजीने पिताके चरणोंमें प्रणाम कर दैत्यराज हिरण्यकशिपुसे हाथ जोड़कर कहा॥ ३३ ॥ |
| प्रणिपत्य पितुः पादौ तदा प्रश्रयभूषणः ।<br>प्रह्लादः प्राह दैत्येन्द्रं कृताञ्जलिपुटस्तथा ॥ ३३ | |
| प्रह्लाद उवाच | **प्रह्लादजी बोले—**पिताजी ! इसमें सन्देह नहीं, गुरुजीने तो मुझे इन सभी विषयोंकी शिक्षा दी है, और मैं उन्हें समझ भी गया हूँ; परन्तु मेरा विचार है कि वे नीतियाँ अच्छी नहीं हैं॥ ३४॥ साम, दान तथा दण्ड और भेद—ये सब उपाय मित्रादिके साधनेके लिये बतलाये गये हैं॥ ३५॥ किन्तु, पिताजी ! आप क्रोध न करें, मुझे तो कोई शत्रु-मित्र आदि दिखायी ही नहीं देते; और हे महाबाहो! जब कोई साध्य ही नहीं है तो इन साधनोंसे लेना ही क्या है? ॥ ३६ ॥ हे तात! सर्वभूतात्मक जगन्नाथ जगन्मय परमात्मा गोविन्दमें भला शत्रु-मित्रकी बात ही कहाँ है? ॥ ३७ ॥ श्रीविष्णुभगवान् तो आपमें, मुझमें और अन्यत्र भी सभी जगह वर्तमान हैं, फिर 'यह मेरा मित्र है और यह शत्रु है' ऐसे भेदभावको स्थान ही कहाँ है? ॥ ३८ ॥ इसलिये, हे तात ! अविद्याजन्य दुष्कर्मोंमें प्रवृत्त करनेवाले इस वाग्जालको सर्वथा छोड़कर अपने शुभके लिये ही यत्न करना चाहिये ॥ ३९ ॥ हे दैत्यराज ! अज्ञानके कारण ही मनुष्योंकी अविद्यामें विद्या-बुद्धि होती है। बालक क्या अज्ञानवश खद्योतको ही अग्नि नहीं समझ लेता? ॥ ४० ॥ कर्म वही है जो बन्धनका कारण न हो और विद्या भी वही है जो मुक्तिकी साधिका हो। इसके अतिरिक्त और कर्म तो परिश्रमरूप तथा अन्य विद्याएँ कला-कौशलमात्र ही हैं ॥ ४१ ॥<br><br>हे महाभाग ! इस प्रकार इन सबको असार समझकर अब आपको प्रणाम कर मैं उत्तम सार बतलाता हूँ, आप श्रवण कीजिये ॥ ४२ ॥ राज्य पानेकी चिन्ता किसे नहीं होती और धनकी अभिलाषा भी किसको नहीं है? तथापि ये दोनों मिलते उन्हींको हैं जिन्हें मिलनेवाले होते हैं॥ ४३ ॥ हे महाभाग ! महत्त्व-प्राप्तिके लिये सभी यत्न करते हैं, तथापि वैभवका कारण तो मनुष्यका भाग्य ही है, उद्यम नहीं ॥ ४४॥ हे प्रभो! जड, अविवेकी, निर्बल और अनीतिज्ञोंको भी भाग्यवश नाना प्रकारके भोग और राज्यादि प्राप्त होते हैं ॥ ४५ ॥ इसलिये जिसे महान् वैभवकी इच्छा हो उसे केवल पुण्यसंचयका ही यत्न करना चाहिये; और जिसे मोक्षकी इच्छा हो उसे भी समत्वलाभका ही प्रयत्न करना चाहिये ॥ ४६ ॥ |
| ममोपदिष्टं सकलं गुरुणा नात्र संशयः ।<br>गृहीतं तु मया किन्तु न सदेतन्मतं मम ॥ ३४ | |
| साम चोपप्रदानं च भेददण्डौ तथापरौ ।<br>उपायाः कथिताः सर्वे मित्रादीनां च साधने ॥ ३५ | |
| तानेवाहं न पश्यामि मित्रादींस्तात मा क्रुधः ।<br>साध्याभावे महाबाहो साधनैः किं प्रयोजनम् ॥ ३६ | |
| सर्वभूतात्मके तात जगन्नाथे जगन्मये ।<br>परमात्मनि गोविन्दे मित्रामित्रकथा कुतः ॥ ३७ | |
| त्वय्यस्ति भगवान् विष्णुर्मयि चान्यत्र चास्ति सः ।<br>यतस्ततोऽयं मित्रं मे शत्रुश्चेति पृथक्कुतः ॥ ३८ | |
| तदेभिरलमल्यर्थं दुष्टारम्भोक्तिविस्तरैः ।<br>अविद्यान्तर्गतैर्यत्नैः कर्त्तव्यस्तात शोभने ॥ ३९ | |
| विद्याबुद्धिरविद्यायामज्ञानात्तात जायते ।<br>बालोऽग्निं किं न खद्योतमसुरेश्वर मन्यते ॥ ४० | |
| तत्कर्म यन्न बन्धाय सा विद्या या विमुक्तये ।<br>आयासायापरं कर्म विद्यान्या शिल्पनैपुणम् ॥ ४१ | |
| तदेतदवगम्याहमसारं सारमुत्तमम् ।<br>निशामय महाभाग प्रणिपत्य ब्रवीमि ते ॥ ४२ | |
| न चिन्तयति को राज्यं को धनं नाभिवाञ्छति ।<br>तथापि भव्यमेवैतदुभयं प्राप्यते नरैः ॥ ४३ | |
| सर्व एव महाभाग महत्त्वं प्रति सोद्यमाः ।<br>तथापि पुंसां भाग्यानि नोद्यमा भूतिहेतवः ॥ ४४ | |
| जडानामविवेकानामशूराणामपि प्रभो ।<br>भाग्यभोज्यानि राज्यानि सन्त्यनीतिम तामपि ॥ ४५ | |
| तस्माद्यतेत पुण्येषु य इच्छेन्महतीं श्रियम् ।<br>यतितव्यं समत्वे च निर्वाणमपि चेच्छता ॥ ४६ |