विष्णु पुराण

विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished558 पृष्ठ
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अ० १९ ] * प्रथम अंश * ९७
| तदेष तोयमध्ये तु समाक्रान्तो महीधरैः।<br>तिष्ठत्वब्दसहस्रान्तं प्राणान्हास्यति दुर्मतिः॥ ६१ | अतः अब यह पर्वतोंसे लदा हुआ हजारों वर्षतक जलमें ही पड़ा रहे, इससे यह दुर्मति स्वयं ही प्राण छोड़ देगा॥ ६१॥ |
| ततो दैत्या दानवाश्च पर्वतैस्तं महोदधौ।<br>आक्रम्य चयनं चक्रुर्योजनानि सहस्रशः॥ ६२ | तब दैत्य और दानवोंने उसे समुद्रमें ही पर्वतोंसे ढँककर उसके ऊपर हजारों योजनका ढेर कर दिया॥ ६२॥ |
| स चित्तः पर्वतैरन्तः समुद्रस्य महामतिः।<br>तुष्टावाह्निकवेलायामेकाग्रमतिरच्युतम्॥ ६३ | उन महामतिने समुद्रमें पर्वतोंसे लाद दिये जानेपर अपने नित्यकर्मोंके समय एकाग्रचित्तसे श्रीअच्युतभगवान्की इस प्रकार स्तुति की॥ ६३॥ |
| प्रह्लाद उवाच | प्रह्लादजी बोले— |
| नमस्ते पुण्डरीकाक्ष नमस्ते पुरुषोत्तम।<br>नमस्ते सर्वलोकात्मन्नमस्ते तिग्मचक्रिणे॥ ६४ | हे कमलनयन! आपको नमस्कार है। हे पुरुषोत्तम! आपको नमस्कार है। हे सर्वलोकात्मन्! आपको नमस्कार है। हे तीक्ष्णचक्रधारी प्रभो! आपको बारम्बार नमस्कार है॥ ६४॥ |
| नमो ब्रह्मण्यदेवाय गोब्राह्मणहिताय च।<br>जगद्धिताय कृष्णाय गोविन्दाय नमो नमः॥ ६५ | गो-ब्राह्मण-हितकारी ब्रह्मण्यदेव भगवान् कृष्णको नमस्कार है। जगत्-हितकारी श्रीगोविन्दको बारम्बार नमस्कार है॥ ६५॥ |
| ब्रह्मत्वे सृजते विश्वं स्थितौ पालयते पुनः।<br>रुद्ररूपाय कल्पान्ते नमस्तुभ्यं त्रिमूर्तये॥ ६६ | आप ब्रह्मारूपसे विश्वकी रचना करते हैं, फिर उसके स्थित हो जानेपर विष्णुरूपसे पालन करते हैं और अन्तमें रुद्ररूपसे संहार करते हैं—ऐसे त्रिमूर्तिधारी आपको नमस्कार है॥ ६६॥ |
| देवा यक्षासुराः सिद्धा नागा गन्धर्वकिन्नराः।<br>पिशाचा राक्षसाश्चैव मनुष्याः पशवस्तथा॥ ६७<br>पक्षिणः स्थावराश्चैव पिपीलिकसरीसृपाः।<br>भूम्यापोऽग्निर्नभो वायुः शब्दः स्पर्शस्तथा रसः॥ ६८<br>रूपं गन्धो मनो बुद्धिरात्मा कालस्तथा गुणाः।<br>एतेषां परमार्थश्च सर्वमेतत्त्वमच्युत॥ ६९ | हे अच्युत! देव, यक्ष, असुर, सिद्ध, नाग, गन्धर्व, किन्नर, पिशाच, राक्षस, मनुष्य, पशु, पक्षी, स्थावर, पिपीलिका (चींटी), सरीसृप, पृथिवी, जल, अग्नि, आकाश, वायु, शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध, मन, बुद्धि, आत्मा, काल और गुण—इन सबके पारमार्थिक रूप आप ही हैं, वास्तवमें आप ही ये सब हैं॥ ६७–६९॥ |
| विद्याविद्ये भवान्सत्यमसत्यं त्वं विषामृते।<br>प्रवृत्तं च निवृत्तं च कर्म वेदोदितं भवान्॥ ७० | आप ही विद्या और अविद्या, सत्य और असत्य तथा विष और अमृत हैं तथा आप ही वेदोक्त प्रवृत्त और निवृत्त कर्म हैं॥ ७०॥ |
| समस्तकर्मभोक्ता च कर्मोपकरणानि च।<br>त्वमेव विष्णो सर्वाणि सर्वकर्मफलं च यत्॥ ७१ | हे विष्णो! आप ही समस्त कर्मोंके भोक्ता और उनकी सामग्री हैं तथा सर्व कर्मोंके जितने भी फल हैं वे सब भी आप ही हैं॥ ७१॥ |
| मय्यन्यत्र तथान्येषु भूतेषु भुवनेषु च।<br>तवैव व्याप्तिरैश्वर्यगुणसंसूचिकी प्रभो॥ ७२ | हे प्रभो! मुझमें तथा अन्यत्र समस्त भूतों और भुवनोंमें आपहीके गुण और ऐश्वर्यकी सूचिका व्याप्ति हो रही है॥ ७२॥ |
| त्वां योगिनश्चिन्तयन्ति त्वां यजन्ति च याजकाः।<br>हव्यकव्यभुगेकस्त्वं पितृदेवस्वरूपधृक्॥ ७३ | योगिगण आपहीका ध्यान धरते हैं और याज्ञिकगण आपहीका यजन करते हैं, तथा पितृगण और देवगणके रूपसे एक आप ही हव्य और कव्यके भोक्ता हैं॥ ७३॥ |
| रूपं महत्ते स्थितमत्र विश्वं<br>ततश्च सूक्ष्मं जगदेतदीश।<br>रूपाणि सर्वाणि च भूतभेदा-<br>स्तेष्वन्तरात्माख्यमतीव सूक्ष्मम्॥ ७४ | हे ईश! यह निखिल ब्रह्माण्ड ही आपका स्थूल रूप है, उससे सूक्ष्म यह संसार (पृथिवीमण्डल) है, उससे भी सूक्ष्म ये भिन्न-भिन्न रूपधारी समस्त प्राणी हैं; उनमें भी जो अन्तरात्मा है वह और भी अत्यन्त सूक्ष्म है॥ ७४॥ |
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