विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 110, कुल 558 में से
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बीसवाँ अध्याय
प्रह्लादकृत भगवत्-स्तुति और भगवान्का आविर्भाव
श्रीपराशर उवाच
एवं सञ्चिन्तयन्विष्णुमभेदेनात्मनो द्विज।
तन्मयत्वमवाप्याग्र्यं मेने चात्मानमच्युतम्॥ १
विसस्मार तथात्मानं नान्यत्किञ्चिदजानत।
अहमेवाव्ययोऽनन्तः परमात्मेत्यचिन्तयत्॥ २
तस्य तद्भावनायोगात्क्षीणपापस्य वै क्रमात्।
शुद्धेऽन्तःकरणे विष्णुस्तस्थौ ज्ञानमयोऽच्युतः॥ ३
योगप्रभावात्प्रह्लादे जाते विष्णुमयेऽसुरे।
चलत्युरगबन्धैस्तैर्मैत्रेय त्रुटितं क्षणात्॥ ४
भ्रान्तग्राहगणः सोर्मिर्ययौ क्षोभं महार्णवः।
चचाल च मही सर्वा सशैलवनकानना॥ ५
स च तं शैलसङ्घातं दैत्यैर्न्यस्तमथोपरि।
उत्क्षिप्य तस्मात्सलिलान्निश्चक्राम महामतिः॥ ६
दृष्ट्वा च स जगद्भूयो गगनाद्युपलक्षणम्।
प्रह्लादोऽस्मीति सस्मार पुनरात्मानमात्मनि॥ ७
तुष्टाव च पुनर्धीमाननादिं पुरुषोत्तमम्।
एकाग्रमतिरव्यग्रो यतवाक्कायमानसः॥ ८
प्रह्लाद उवाच
ॐ नमः परमार्थार्थ स्थूलसूक्ष्म क्षराक्षर।
व्यक्ताव्यक्त कलातीत सकलेश निरञ्जन॥ ९
गुणाञ्जन गुणाधार निर्गुणात्मन् गुणस्थित।
मूर्त्तामूर्त्तमहामूर्ते सूक्ष्ममूर्ते स्फुटास्फुट॥ १०
करालसौम्यरूपात्मन्विद्याऽविद्यामयाच्युत।
सदसद्रूपसद्भाव सदसद्भावभावन॥ ११
नित्यानित्यप्रपञ्चात्मन्निष्प्रपञ्चामलाश्रित।
एकानेक नमस्तुभ्यं वासुदेवादिकारण॥ १२
श्रीपराशरजी बोले— हे द्विज! इस प्रकार भगवान् विष्णुको अपनेसे अभिन्न चिन्तन करते-करते पूर्ण तन्मयता प्राप्त हो जानेसे उन्होंने अपनेको अच्युत रूप ही अनुभव किया॥ १॥ वे अपने-आपको भूल गये; उस समय उन्हें श्रीविष्णुभगवान्के अतिरिक्त और कुछ भी प्रतीत न होता था। बस, केवल यही भावना चित्तमें थी कि मैं ही अव्यय और अनन्त परमात्मा हूँ॥ २॥ उस भावनाके योगसे वे क्षीण-पाप हो गये और उनके शुद्ध अन्तःकरणमें ज्ञानस्वरूप अच्युत श्रीविष्णुभगवान् विराजमान हुए॥ ३॥
हे मैत्रेय! इस प्रकार योगबलसे असुर प्रह्लादजीके विष्णुमय हो जानेपर उनके विचलित होनेसे वे नागपाश एक क्षणभरमें ही टूट गये॥ ४॥ भ्रमणशील ग्राहगण और तरलतरंगोंसे पूर्ण सम्पूर्ण महासागर क्षुब्ध हो गया, तथा पर्वत और वनोपवनोंसे पूर्ण समस्त पृथिवी हिलने लगी॥ ५॥ तथा महामति प्रह्लादजी अपने ऊपर दैत्योंद्वारा लादे गये उस सम्पूर्ण पर्वत-समूहको दूर फेंककर जलसे बाहर निकल आये॥ ६॥ तब आकाशादिरूप जगत्को फिर देखकर उन्हें चित्तमें यह पुनः भान हुआ कि मैं प्रह्लाद हूँ॥ ७॥ और उन महाबुद्धिमान्ने मन, वाणी और शरीरके संयमपूर्वक धैर्य धारणकर एकाग्रचित्तसे पुनः भगवान् अनादि पुरुषोत्तमकी स्तुति की॥ ८॥
प्रह्लादजी कहने लगे— हे परमार्थ! हे अर्थ (दृश्यरूप)! हे स्थूलसूक्ष्म (जाग्रत्-स्वप्नदृश्य-स्वरूप)! हे क्षराक्षर (कार्य-कारणरूप)! हे व्यक्ताव्यक्त (दृश्यादृश्यस्वरूप)! हे कलातीत! हे सकलेश्वर! हे निरंजन देव! आपको नमस्कार है॥ ९॥ हे गुणोंको अनुरंजित करनेवाले! हे गुणाधार! हे निर्गुणात्मन्! हे गुणस्थित! हे मूर्त्त और अमूर्तरूप महामूर्तिमन्! हे सूक्ष्ममूर्ते! हे प्रकाशाप्रकाशस्वरूप! [आपको नमस्कार है]॥ १०॥ हे विकराल और सुन्दररूप! हे विद्या और अविद्यामय अच्युत! हे सदसत् (कार्यकारण) रूप जगत्के उद्भवस्थान और सदसज्जगत्के पालक! [आपको नमस्कार है]॥ ११॥ हे नित्यानित्य (आकाशघटादिरूप) प्रपञ्चात्मन्! हे प्रपंचसे पृथक् रहनेवाले! हे ज्ञानियोंके आश्रयरूप! हे एकानेकरूप आदिकारण वासुदेव! [आपको नमस्कार है]॥ १२॥