विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 129, कुल 558 में से
संदर्भ में पढ़ें| ११८ | * श्रीविष्णुपुराण * | [ अ० ३ |
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तीसरा अध्याय
भारतादि नौ खण्डोंका विभाग
श्रीपराशर उवाच
उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्।
वर्षं तद्भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः॥ १
नवयोजनसाहस्रो विस्तारोऽस्य महामुने।
कर्मभूमिरियं स्वर्गमपवर्गं च गच्छताम्॥ २
महेन्द्रो मलयः सह्यः शुक्तिमानृक्षपर्वतः।
विन्ध्यश्च पारियात्रश्च सप्तात्र कुलपर्वताः॥ ३
अतः सम्प्राप्यते स्वर्गो मुक्तिमस्मात्प्रयान्ति वै।
तिर्यक्त्वं नरकं चापि यान्त्यतः पुरुषा मुने॥ ४
इतः स्वर्गश्च मोक्षश्च मध्यं चान्तश्च गम्यते।
न खल्वन्यत्र मर्त्यानां कर्म भूमौ विधीयते॥ ५
भारतस्यास्य वर्षस्य नवभेदान्निशामय।
इन्द्रद्वीपः कसेरुश्च ताम्रपर्णो गभस्तिमान्॥ ६
नागद्वीपस्तथा सौम्यो गन्धर्वस्त्वथ वारुणः।
अयं तु नवमस्तेषां द्वीपः सागरसंवृतः॥ ७
योजनानां सहस्रं तु द्वीपोऽयं दक्षिणोत्तरात्।
पूर्वे किराता यस्यान्ते पश्चिमे यवनाः स्थिताः॥ ८
ब्राह्मणाःक्षत्रिया वैश्या मध्ये शूद्राश्च भागशः।
इज्यायुद्धवणिज्याद्यैर्वर्तयन्तो व्यवस्थिताः॥ ९
शतद्रूचन्द्रभागाद्या हिमवत्पादनिर्गताः।
वेदस्मृतिमुखाद्याश्च पारियात्रोद्भवा मुने॥ १०
नर्मदा सुरसाद्याश्च नद्यो विन्ध्याद्रिनिर्गताः।
तापीपयोष्णीनिर्विन्ध्याप्रमुखा ऋक्षसम्भवाः॥ ११
गोदावरी भीमरथी कृष्णवेण्यादिकास्तथा।
सह्यपादोद्भवा नद्यः स्मृताः पापभयापहाः॥ १२
कृतमाला ताम्रपर्णीप्रमुखा मलयोद्भवाः।
त्रिसामा चार्यकुल्याद्या महेन्द्रप्रभवाः स्मृताः॥ १३
ऋषिकुल्याकुमाराद्याः शुक्तिमत्पादसम्भवाः।
आसां नद्युपनद्यश्च सन्त्यन्याश्च सहस्रशः॥ १४
श्रीपराशरजी बोले— हे मैत्रेय! जो समुद्रके उत्तर तथा हिमालयके दक्षिणमें स्थित है वह देश भारतवर्ष कहलाता है। उसमें भरतकी सन्तान बसी हुई है॥ १॥ हे महामुने! इसका विस्तार नौ हजार योजन है। यह स्वर्ग और अपवर्ग प्राप्त करनेवालोंकी कर्मभूमि है॥ २॥ इसमें महेन्द्र, मलय, सह्य, शुक्तिमान्, ऋक्ष, विन्ध्य और पारियात्र—ये सात कुलपर्वत हैं॥ ३॥ हे मुने! इसी देशमें मनुष्य शुभकर्मोंद्वारा स्वर्ग अथवा मोक्ष प्राप्त कर सकते हैं और यहींसे [पाप-कर्मोंमें प्रवृत्त होनेपर] वे नरक अथवा तिर्यग्योनिमें पड़ते हैं॥ ४॥ यहींसे [कर्मानुसार] स्वर्ग, मोक्ष, अन्तरिक्ष अथवा पाताल आदि लोकोंको प्राप्त किया जा सकता है, पृथिवीमें यहाँके सिवा और कहीं भी मनुष्यके लिये कर्मकी विधि नहीं है॥ ५॥
इस भारतवर्षके नौ भाग हैं; उनके नाम ये हैं—इन्द्रद्वीप, कसेरु, ताम्रपर्ण, गभस्तिमान्, नागद्वीप, सौम्य, गन्धर्व और वारुण तथा यह समुद्रसे घिरा हुआ द्वीप उनमें नवाँ है॥ ६-७॥ यह द्वीप उत्तरसे दक्षिणतक सहस्र योजन है। इसके पूर्वीय भागमें किरातलोग और पश्चिमीयमें यवन बसे हुए हैं॥ ८॥ तथा यज्ञ, युद्ध और व्यापार आदि अपने-अपने कर्मोंकी व्यवस्थाके अनुसार आचरण करते हुए ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रगण वर्णविभागानुसार मध्यमें रहते हैं॥ ९॥ हे मुने! इसकी शतद्रू और चन्द्रभागा आदि नदियाँ हिमालयकी तलैटीसे वेद और स्मृति आदि पारियात्र पर्वतसे, नर्मदा और सुरसा आदि विन्ध्याचलसे तथा तापी, पयोष्णी और निर्विन्ध्या आदि ऋक्षगिरिसे निकली हैं॥ १०-११॥ गोदावरी, भीमरथी और कृष्णवेणी आदि पापहारिणी नदियाँ सह्यपर्वतसे उत्पन्न हुई कही जाती हैं॥ १२॥ कृतमाला और ताम्रपर्णी आदि मलयाचलसे, त्रिसामा और आर्यकुल्या आदि महेन्द्रगिरिसे तथा ऋषिकुल्या और कुमारी आदि नदियाँ शुक्तिमान् पर्वतसे निकली हैं। इनकी और भी सहस्रों शाखा नदियाँ और उपनदियाँ हैं॥ १३-१४॥