भारतकोश
विष्णु पुराण

विष्णु पुराण

Vishnu Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

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१२०* श्रीविष्णुपुराण *[ अ० ४

नववर्षं तु मैत्रेय जम्बूद्वीपमिदं मया।
लक्षयोजनविस्तारं सङ्क्षेपात्कथितं तव॥ २७
जम्बूद्वीपं समावृत्य लक्षयोजनविस्तरः।
मैत्रेय वलयाकारः स्थितः क्षारोदधिर्बहिः॥ २८

| हे मैत्रेय! इस प्रकार लाख योजनके विस्तारवाले नववर्ष-विशिष्ट इस जम्बूद्वीपका मैंने तुमसे संक्षेपसे वर्णन किया॥ २७॥ हे मैत्रेय! इस जम्बूद्वीपको बाहर चारों ओरसे लाख योजनके विस्तारवाले वलयाकार खारे पानीके समुद्रने घेरा हुआ है॥ २८॥

इति श्रीविष्णुपुराणे द्वितीयेऽंशे तृतीयोऽध्यायः॥ ३॥


चौथा अध्याय

प्लक्ष तथा शाल्मल आदि द्वीपोंका विशेष वर्णन

श्रीपराशर उवाच

क्षारोदेन यथा द्वीपो जम्बूसंज्ञोऽभिवेष्टितः।
संवेष्ट्य क्षारमुदधिं प्लक्षद्वीपस्तथा स्थितः॥ १

जम्बूद्वीपस्य विस्तारः शतसाहस्रसम्मितः।
स एव द्विगुणो ब्रह्मन् प्लक्षद्वीप उदाहृतः॥ २

सप्त मेधातिथेः पुत्राः प्लक्षद्वीपेश्वरस्य वै।
ज्येष्ठः शान्तहयो नाम शिशिरस्तदनन्तरः॥ ३

सुखोदयस्तथानन्दः शिवः क्षेमक एव च।
ध्रुवश्च सप्तमस्तेषां प्लक्षद्वीपेश्वरा हि ते॥ ४

पूर्वं शान्तहयं वर्षं शिशिरं च सुखं तथा।
आनन्दं च शिवं चैव क्षेमकं ध्रुवमेव च॥ ५

मर्यादाकारकास्तेषां तथान्ये वर्षपर्वताः।
सप्तैव तेषां नामानि शृणुष्व मुनिसत्तम॥ ६

गोमेदश्चैव चन्द्रश्च नारदो दुन्दुभिस्तथा।
सोमकः सुमनाश्चैव वैभ्राजश्चैव सप्तमः॥ ७

वर्षाचलेषु रम्येषु वर्षेष्वेतेषु चानघाः।
वसन्ति देवगन्धर्वसहिताः सततं प्रजाः॥ ८

तेषु पुण्या जनपदाश्चिराच्च म्रियते जनः।
नाधयो व्याधयो वापि सर्वकालसुखं हि तत्॥ ९

तेषां नद्यस्तु सप्तैव वर्षाणां च समुद्रगाः।
नामतस्ताः प्रवक्ष्यामि श्रुताः पापं हरन्ति याः॥ १०

अनुतप्ता शिखी चैव विपाशा त्रिदिवाक्लमा।
अमृता सुकृता चैव सप्तैतास्तत्र निम्नगाः॥ ११

श्रीपराशरजी बोले— जिस प्रकार जम्बूद्वीप क्षारसमुद्रसे घिरा हुआ है उसी प्रकार क्षारसमुद्रको घेरे हुए प्लक्षद्वीप स्थित है॥ १॥ जम्बूद्वीपका विस्तार एक लक्ष योजन है; और हे ब्रह्मन्! प्लक्षद्वीपका उससे दूना कहा जाता है॥ २॥ प्लक्षद्वीपके स्वामी मेधातिथिके सात पुत्र हुए। उनमें सबसे बड़ा शान्तहय था और उससे छोटा शिशिर॥ ३॥ उनके अनन्तर क्रमशः सुखोदय, आनन्द, शिव और क्षेमक थे तथा सातवाँ ध्रुव था। ये सब प्लक्षद्वीपके अधीश्वर हुए॥ ४॥ [उनके अपने-अपने अधिकृत वर्षोंमें] प्रथम शान्तहयवर्ष है तथा अन्य शिशिरवर्ष, सुखोदयवर्ष, आनन्दवर्ष, शिववर्ष, क्षेमकवर्ष और ध्रुववर्ष हैं॥ ५॥ तथा उनकी मर्यादा निश्चित करनेवाले अन्य सात पर्वत हैं। हे मुनिश्रेष्ठ! उनके नाम ये हैं, सुनो—॥ ६॥ गोमेद, चन्द्र, नारद, दुन्दुभि, सोमक, सुमना और सातवाँ वैभ्राज॥ ७॥

इन अति सुरम्य वर्ष-पर्वतों और वर्षोंमें देवता और गन्धर्वोंके सहित सदा निष्पाप प्रजा निवास करती है॥ ८॥ वहाँके निवासीगण पुण्यवान् होते हैं और वे चिरकालतक जीवित रहकर मरते हैं; उनको किसी प्रकारकी आधि-व्याधि नहीं होती, निरन्तर सुख ही रहता है॥ ९॥ उन वर्षोंकी सात ही समुद्रगामिनी नदियाँ हैं। उनके नाम मैं तुम्हें बतलाता हूँ जिनके श्रवणमात्रसे वे पापोंको दूर कर देती हैं॥ १०॥ वहाँ अनुतप्ता, शिखी, विपाशा, त्रिदिवा, अक्लमा, अमृता और सुकृता—ये ही सात नदियाँ हैं॥ ११॥