विष्णु पुराण

विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished558 पृष्ठ
पृष्ठ 159, कुल 558 में से
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१४८ * श्रीविष्णुपुराण * [अ० ११
| संस्कृत | हिन्दी अनुवाद |
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| अङ्गमेषा त्रयी विष्णोर्ऋग्यजुःसामसंज्ञिता।<br>विष्णुशक्तिरवस्थानं सदादित्ये करोति सा॥ ११<br>न केवलं रवेः शक्तिर्वैष्णवी सा त्रयीमयी।<br>ब्रह्माथ पुरुषो रुद्रस्त्रयमेतत्तत्रयीमयम्॥ १२<br>सर्गादौ ऋङ्मयो ब्रह्मा स्थितौ विष्णुर्यजुर्मयः।<br>रुद्रः साममयोऽन्ताय तस्मात्तस्याशुचिर्ध्वनिः॥ १३<br>एवं सा सात्त्विकी शक्तिर्वैष्णवी या त्रयीमयी।<br>आत्मसप्तगणस्थं तं भास्वन्तमधितिष्ठति॥ १४<br>तया चाधिष्ठितः सोऽपि जाज्वलीति स्वरश्मिभिः।<br>तमः समस्तजगतां नाशं नयति चाखिलम्॥ १५<br>स्तुवन्ति चैनं मुनयो गन्धर्वैर्गीयते पुरः।<br>नृत्यन्त्योऽप्सरसो यान्ति तस्य चानु निशाचराः॥ १६<br>वहन्ति पन्नगा यक्षैः क्रियतेऽभीषुसङ्ग्रहः।<br>बालखिल्यास्तथैवैनं परिवार्य समासते॥ १७<br>नोदेता नास्तमेता च कदाचिच्छक्तिरूपधृक्।<br>विष्णुर्विष्णोः पृथक् तस्य गणस्सप्तविधोऽप्ययम्॥ १८<br>स्तम्भस्थदर्पणस्येव योऽयमासन्नतां गतः।<br>छायादर्शनसंयोगं स तं प्राप्नोत्यथात्मनः॥ १९<br>एवं सा वैष्णवी शक्तिर्नैवापैति ततो द्विज।<br>मासानुमासं भास्वन्तमध्यास्ते तत्र संस्थितम्॥ २०<br>पितृदेवमनुष्यादीन्स सदाप्याययन्प्रभुः।<br>परिवर्तत्यहोरात्रकारणं सविता द्विज॥ २१<br>सूर्यरश्मिः सुषुम्णा यस्तर्पितस्तेन चन्द्रमाः।<br>कृष्णापक्षेऽमरैः शश्वत्पीयते वै सुधामयः॥ २२<br>पीतं तं द्विक्लं सोमं कृष्णपक्षक्षये द्विज।<br>पिबन्ति पितरस्तेषां भास्करात्तर्पणं तथा॥ २३<br>आदत्ते रश्मिभिर्यन्तु क्षितिसंस्थं रसं रविः।<br>तमुत्सृजति भूतानां पुष्ट्यर्थं सस्यवृद्धये॥ २४ | यह ऋक्-यजुः-सामस्वरूपिणी वेदत्रयी भगवान् विष्णुका ही अंग है। यह विष्णु-शक्ति सर्वदा आदित्यमें रहती है॥ ११॥<br>यह त्रयीमयी वैष्णवी शक्ति केवल सूर्यहीकी अधिष्ठात्री हो, सो नहीं; बल्कि ब्रह्मा, विष्णु और महादेव भी त्रयीमय ही हैं॥ १२॥ सर्गके आदिमें ब्रह्मा ऋङ्मय हैं, उसकी स्थितिके समय विष्णु यजुर्मय हैं तथा अन्तकालमें रुद्र साममय हैं। इसीलिये सामगानकी ध्वनि अपवित्र* मानी गयी है॥ १३॥ इस प्रकार वह त्रयीमयी सात्त्विकी वैष्णवी शक्ति अपने सप्तगणोंमें स्थित आदित्यमें ही [अतिशयरूपसे] अवस्थित होती है॥ १४॥ उससे अधिष्ठित सूर्यदेव भी अपनी प्रखर रश्मियोंसे अत्यन्त प्रज्वलित होकर संसारके सम्पूर्ण अन्धकारको नष्ट कर देते हैं॥ १५॥<br>उन सूर्यदेवकी मुनिगण स्तुति करते हैं, गन्धर्वगण उनके सम्मुख यशोगान करते हैं। अप्सराएँ नृत्य करती हुई चलती हैं, राक्षस रथके पीछे रहते हैं, सर्पगण रथका साज सजाते हैं और यक्ष घोड़ोंकी बागडोर सँभालते हैं तथा बालखिल्यादि रथको सब ओरसे घेरे रहते हैं॥ १६-१७॥ त्रयीशक्तिरूप भगवान् विष्णुका न कभी उदय होता है और न अस्त [अर्थात् वे स्थायीरूपसे सदा विद्यमान रहते हैं]; ये सात प्रकारके गण तो उनसे पृथक् हैं॥ १८॥ स्तम्भमें लगे हुए दर्पणके निकट जो कोई जाता है उसीको अपनी छाया दिखायी देने लगती है॥ १९॥ हे द्विज! इसी प्रकार वह वैष्णवी शक्ति सूर्यके रथसे कभी चलायमान नहीं होती और प्रत्येक मासमें पृथक्-पृथक् सूर्यके [परिवर्तित होकर] उसमें स्थित होनेपर वह उसकी अधिष्ठात्री होती है॥ २०॥<br>हे द्विज! दिन और रात्रिके कारणस्वरूप भगवान् सूर्य पितृगण, देवगण और मनुष्यादिको सदा तृप्त करते घूमते रहते हैं॥ २१॥ सूर्यकी जो सुषुम्ना नामकी किरण है उससे शुक्लपक्षमें चन्द्रमाका पोषण होता है और फिर कृष्णपक्षमें उस अमृतमय चन्द्रमाकी एक-एक कलाका देवगण निरन्तर पान करते हैं॥ २२॥ हे द्विज! कृष्णपक्षके क्षय होनेपर [चतुर्दशीके अनन्तर] दो कलायुक्त चन्द्रमाका पितृगण पान करते हैं। इस प्रकार सूर्यद्वारा पितृगणका तर्पण होता है॥ २३॥<br>सूर्य अपनी किरणोंसे पृथिवीसे जितना जल खींचता है उस सबको प्राणियोंकी पुष्टि और अन्नकी वृद्धिके लिये बरसा देता है॥ २४॥ |
* रुद्रके नाशकारी होनेसे उनका नाम अपवित्र माना गया है अतः सामगानके समय (रातमें) ऋक् तथा यजुर्वेदके अध्ययनका निषेध किया गया है। इसमें गौतमकी स्मृति प्रमाण है—'न सामध्वनावृग्यजुषी' अर्थात् सामगानके समय ऋक्-यजुःका अध्ययन न करे।