विष्णु पुराण

विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished558 पृष्ठ
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ॐ श्रीमन्नारायणाय नमः
श्रीविष्णुपुराण
तृतीय अंश
पहला अध्याय
पहले सात मन्वन्तरोंके मनु, इन्द्र, देवता, सप्तर्षि और मनुपुत्रोंका वर्णन
| श्रीमैत्रेय उवाच | श्रीमैत्रेयजी बोले— |
|---|---|
| कथिता गुरुणा सम्यग्भूसमुद्रादिसंस्थितिः।<br>सूर्यादीनां च संस्थानं ज्योतिषां चातिविस्तरात्॥ १ | हे गुरुदेव! आपने पृथिवी और समुद्र आदिकी स्थिति तथा सूर्य आदि ग्रहगणके संस्थानका मुझसे भली प्रकार अति विस्तारपूर्वक वर्णन किया॥ १॥ |
| देवादीनां तथा सृष्टिर्ऋषीणां चापि वर्णिता।<br>चातुर्वर्ण्यस्य चोत्पत्तिस्तिर्यग्यौनिगतस्य च॥ २ | आपने देवता आदि और ऋषिगणोंकी सृष्टि तथा चातुर्वर्ण्य एवं तिर्यक्-योनिगत जीवोंकी उत्पत्तिका भी वर्णन किया॥ २॥ |
| ध्रुवप्रह्लादचरितं विस्तराच्च त्वयोदितम्।<br>मन्वन्तराण्यशेषाणि श्रोतुमिच्छाम्यनुक्रमात्॥ ३ | ध्रुव और प्रह्लादके चरित्रोंको भी आपने विस्तारपूर्वक सुना दिया। अतः हे गुरो! अब मैं आपके मुखारविन्दसे सम्पूर्ण मन्वन्तर तथा इन्द्र और देवताओंके सहित मन्वन्तरोंके अधिपति समस्त मनुओंका वर्णन सुनना चाहता हूँ [आप वर्णन कीजिये]॥ ३-४॥ |
| मन्वन्तराधिपांश्चैव शक्रदेवपुरोगमान्।<br>भवता कथितानेताञ्छ्रोतुमिच्छाम्यहं गुरो॥ ४ | |
| श्रीपराशर उवाच | श्रीपराशरजी बोले— |
| अतीतानागतानीह यानि मन्वन्तराणि वै।<br>तान्यहं भवतः सम्यक्कथयामि यथाक्रमम्॥ ५ | भूतकालमें जितने मन्वन्तर हुए हैं तथा आगे भी जो-जो होंगे, उन सबका मैं तुमसे क्रमशः वर्णन करता हूँ॥ ५॥ |
| स्वायम्भुवो मनुः पूर्वं परः स्वारोचिषस्तथा।<br>उत्तमस्तामसश्चैव रैवतश्चाक्षुषस्तथा॥ ६ | प्रथम मनु स्वायम्भुव थे। उनके अनन्तर क्रमशः स्वारोचिष, उत्तम, तामस, रैवत और चाक्षुष हुए॥ ६॥ |
| षडेते मनवोऽतीतास्साम्प्रतं तु रवेस्सुतः।<br>वैवस्वतोऽयं यस्यैतत्स्सप्तमं वर्ततेऽन्तरम्॥ ७ | ये छः मनु पूर्वकालमें हो चुके हैं। इस समय सूर्यपुत्र वैवस्वत मनु हैं, जिनका यह सातवाँ मन्वन्तर वर्तमान है॥ ७॥ |
| स्वायम्भुवं तु कथितं कल्पादावन्तरं मया।<br>देवास्सप्तर्षयश्चैव यथावत्कथिता मया॥ ८ | कल्पके आदिमें जिस स्वायम्भुव-मन्वन्तरके विषयमें मैंने कहा है, उसके देवता और सप्तर्षियोंका तो मैं पहले ही यथावत् वर्णन कर चुका हूँ॥ ८॥ |
| अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि मनोस्स्वारोचिषस्य तु।<br>मन्वन्तराधिपान्सम्यग्देवर्षींस्तत्सुतांस्तथा॥ ९ | अब आगे मैं स्वारोचिष मनुके मन्वन्तराधिकारी देवता, ऋषि और मनुपुत्रोंका स्पष्टतया वर्णन करूँगा॥ ९॥ |
| पारावतास्तुषिता देवास्स्वारोचिषेऽन्तरे।<br>विपश्चित्तत्र देवेन्द्रो मैत्रेयासीन्महाबलः॥ १० | हे मैत्रेय! स्वारोचिषमन्वन्तरमें पारावत और तुषितगण देवता थे, महाबली विपश्चित् देवराज इन्द्र थे॥ १०॥ |
| ऊर्जः स्तम्भस्तथा प्राणो वातोऽथ पृषभस्तथा।<br>निरयश्च परीवांश्च तत्र सप्तर्षयोऽभवन्॥ ११ | ऊर्ज, स्तम्भ, प्राण, वात, पृषभ, निरय और परीवान्—ये उस समय सप्तर्षि थे॥ ११॥ |
| चैत्रकिम्पुरुषाद्याश्च सुतास्स्वारोचिषस्य तु।<br>द्वितीयमेतद्व्याख्यातमन्तरं शृणु चोत्तमम्॥ १२ | तथा चैत्र और किम्पुरुष आदि स्वारोचिषमनुके पुत्र थे। इस प्रकार तुमसे द्वितीय मन्वन्तरका वर्णन कर दिया। अब उत्तम-मन्वन्तरका विवरण सुनो॥ १२॥ |
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