विष्णु पुराण

विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished558 पृष्ठ
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२०२ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० ११
| अभुक्तवत्सु चैतेषु भुञ्जन्भुङ्क्ते स दुष्कृतम्।<br>मृतश्च गत्वा नरकं श्लेष्मभुग्जायते नरः॥ ७२ | इन सबको भोजन कराये बिना जो स्वयं भोजन कर लेता है वह पापमय भोजन करता है और अन्तमें मरकर नरकमें श्लेष्मभोजी कीट होता है॥ ७२॥ |
| अस्नाताशी मलं भुङ्क्ते ह्यजपी पूयशोणितम्।<br>असंस्कृतान्रभुङ्ग्मूत्रं बालादिप्रथमं शकृत्॥ ७३ | जो व्यक्ति स्नान किये बिना भोजन करता है वह मल भक्षण करता है, जप किये बिना भोजन करनेवाला रक्त और पूय पान करता है, संस्कारहीन अन्न खानेवाला मूत्र पान करता है तथा जो बालक-वृद्ध आदिसे पहले आहार करता है वह विष्ठाहारी है। |
| अहोमी च कृमीन्भुङ्क्ते अदत्त्वा विषमश्नुते॥ ७४ | इसी प्रकार बिना होम किये भोजन करनेवाला मानो कीड़ोंको खाता है और बिना दान किये खानेवाला विष-भोजी है॥ ७३-७४॥ |
| तस्माच्छृणुष्व राजेन्द्र यथा भुञ्जीत वै गृही।<br>भुञ्जतश्च यथा पुंसः पापबन्धो न जायते॥ ७५ | अतः हे राजेन्द्र! गृहस्थको जिस प्रकार भोजन करना चाहिये—जिस प्रकार भोजन करनेसे पुरुषको पाप-बन्धन नहीं होता तथा इहलोकमें अत्यन्त आरोग्य, बल, बुद्धिकी प्राप्ति और अरिष्टोंकी शान्ति होती है और जो शत्रुपक्षका ह्रास करनेवाली है—वह भोजनविधि सुनो॥ ७५-७६॥ |
| इह चारोग्यविपुलं बलबुद्धिस्तथा नृप।<br>भवत्यरिष्टशान्तिश्च वैरिपक्षाभिचारिका॥ ७६ | |
| स्नातो यथावत्कृत्वा च देवर्षिपितृतर्पणम्।<br>प्रशस्तरत्नपाणिस्तु भुञ्जीत प्रयतो गृही॥ ७७ | गृहस्थको चाहिये कि स्नान करनेके अनन्तर यथाविधि देव, ऋषि और पितृगणका तर्पण करके हाथमें उत्तम रत्न धारण किये पवित्रतापूर्वक भोजन करे॥ ७७॥ |
| कृते जपे हुते वह्नौ शुद्धवस्त्रधरो नृप।<br>दत्त्वातिथिभ्यो विप्रेभ्यो गुरुभ्यस्संश्रिताय च।<br>पुण्यगन्धश्शस्तमाल्यधारी चैव नरेश्वर॥ ७८ | हे नृप! जप तथा अग्निहोत्रके अनन्तर शुद्ध वस्त्र धारण कर अतिथि, ब्राह्मण, गुरुजन और अपने आश्रित (बालक एवं वृद्धों)-को भोजन करा सुन्दर सुगन्धयुक्त उत्तम पुष्पमाला तथा एक ही वस्त्र धारण किये हाथ-पाँव और मुँह धोकर प्रीतिपूर्वक भोजन करे। हे राजन्! भोजनके समय इधर-उधर न देखे॥ ७८-७९॥ |
| एकवस्त्रधरोऽथार्द्रपाणिपादो महीपते।<br>विशुद्धवदनः प्रीतो भुञ्जीत न विदिङ्मुखः॥ ७९ | |
| प्राङ्मुखोदङ्मुखो वापि न चैवान्यमना नरः।<br>अन्नं प्रशस्तं पथ्यं च प्रोक्षितं प्रोक्षणोदकैः॥ ८० | मनुष्यको चाहिये कि पूर्व अथवा उत्तरकी ओर मुख करके, अन्यमना न होकर उत्तम और पथ्य अन्नको प्रोक्षणके लिये रखे हुए मन्त्रपूत जलसे छिड़क कर भोजन करे॥ ८०॥ |
| न कुत्सिताहृतं नैव जुगुप्सावदसंस्कृतम्।<br>दत्त्वा तु भक्तं शिष्येभ्यः क्षुधितेभ्यस्तथा गृही॥ ८१ | जो अन्न दुराचारी व्यक्तिका लाया हुआ हो, घृणाजनक हो अथवा बलिवैश्वदेव आदि संस्कारशून्य हो उसको ग्रहण न करे। हे द्विज! गृहस्थ पुरुष अपने खाद्यमेंसे कुछ अंश अपने शिष्य तथा अन्य भूखे-प्यासोंको देकर उत्तम और शुद्ध पात्रमें शान्तचित्तसे भोजन करे॥ ८१-८२॥ |
| प्रशस्तशुद्धपात्रे तु भुञ्जीताकुपितो द्विजः॥ ८२ | |
| नासन्दिसंस्थिते पात्रे नादेशे च नरेश्वर।<br>नाकाले नातिसंकीर्णे दत्त्वाग्रं च नरोऽग्नये॥ ८३ | हे नरेश्वर! किसी बेंत आदिके आसन (कुर्सी आदि)-पर रखे हुए पात्रमें, अयोग्य स्थानमें, असमय (सन्ध्या आदि काल)-में अथवा अत्यन्त संकुचित स्थानमें कभी भोजन न करे। मनुष्यको चाहिये कि [परोसे हुए भोजनका] अग्र-भाग अग्निको देकर भोजन करे॥ ८३॥ |
| मन्त्राभिमन्त्रितं शस्तं न च पर्युषितं नृप।<br>अन्यत्र फलमूलेभ्यश्शुष्कशाखादिकात्तथा॥ ८४ | हे नृप! जो अन्न मन्त्रपूत और प्रशस्त हो तथा जो बासी न हो उसीको भोजन करे। परंतु फल, मूल और सूखी शाखाओंको तथा बिना पकाये हुए लेह्य (चटनी) आदि और गुड़के पदार्थोंकि |