भारतकोश
विष्णु पुराण

विष्णु पुराण

Vishnu Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

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अ० ११ ] * तृतीय अंश * २०५


प्राच्यां दिशि शिरश्शस्तं याम्यायामथ वा नृप।<br>सदैव स्वपतः पुंसो विपरीतं तु रोगदम्॥ ११३हे नृप! सोनेके समय सदा पूर्व अथवा दक्षिणकी ओर सिर रखना चाहिये। इनके विपरीत दिशाओंकी ओर सिर रखनेसे रोगोंकी उत्पत्ति होती है॥ ११३॥
ऋतावुपेगमश्शस्तस्स्वपत्यामवनीपते।<br>पुन्नामर्क्षे शुभे काले ज्येष्ठाद्युग्मासु रात्रिषु॥ ११४हे पृथिवीपते! ऋतुकालमें अपनी ही स्त्रीसे संग करना उचित है। पुल्लिङ्ग नक्षत्रमें युग्म और उनमें भी पीछेकी रात्रियोंमें शुभ समयमें स्त्रीप्रसंग करे॥ ११४॥
नादूनां तु स्त्रियं गच्छेन्नातुरां न रजस्वलाम्।<br>नानिष्टां न प्रकुपितां न त्रस्तां न च गर्भिणीम्॥ ११५किन्तु यदि स्त्री अप्रसन्ना, रोगिणी, रजस्वला, निरभिलाषिणी, क्रोधिता, दुःखिनी अथवा गर्भिणी हो तो उसका संग न करे॥ ११५॥
नादक्षिणां नान्यकामां नाकामां नान्ययोषितम्।<br>क्षुत्क्षामां नातिभुक्तां वा स्वयं चैभिर्गुणैर्युतः॥ ११६जो सीधे स्वभावकी न हो, पराभिलाषिणी अथवा निरभिलाषिणी हो, क्षुधार्ता हो, अधिक भोजन किये हुए हो अथवा परस्त्री हो उसके पास न जाय; और यदि अपनेमें ये दोष हों तो भी स्त्रीगमन न करे॥ ११६॥
स्नातस्स्रग्गन्धधृक्प्रीतो नाध्मातः क्षुधितोऽपि वा।<br>सकामस्सानुरागश्च व्यवायं पुरुषो व्रजेत्॥ ११७पुरुषको उचित है कि स्नान करनेके अनन्तर माला और गन्ध धारण कर काम और अनुरागयुक्त होकर स्त्रीगमन करे। जिस समय अति भोजन किया हो अथवा क्षुधित हो उस समय उसमें प्रवृत्त न हो॥ ११७॥
चतुर्दश्यष्टमी चैव तथामा चाथ पूर्णिमा।<br>पर्वाण्येतानि राजेन्द्र रविसंक्रान्तिरेव च॥ ११८हे राजेन्द्र! चतुर्दशी, अष्टमी, अमावास्या, पूर्णिमा और सूर्यकी संक्रान्ति—ये सब पर्वदिन हैं॥ ११८॥
तैलस्त्रीमांससम्भोगी सर्वेष्वेतेषु वै पुमान्।<br>विण्मूत्रभोजनं नाम प्रयाति नरकं मृतः॥ ११९इन पर्वदिनोंमें तैल, स्त्री अथवा मांसका भोग करनेवाला पुरुष मरनेपर विष्ठा और मूत्रसे भरे नरकमें पड़ता है॥ ११९॥
अशेषपर्वस्वेतेषु तस्मात्संयमिभिर्बुधैः।<br>भाव्यं सच्छास्त्रदेवेज्याध्यायनजप्यपरैर्नरैः॥ १२०संयमी और बुद्धिमान् पुरुषोंको इन समस्त पर्वदिनोंमें सच्छास्त्रावलोकन, देवोपासना, यज्ञानुष्ठान, ध्यान और जप आदिमें लगे रहना चाहिये॥ १२०॥
नान्योनावयोनौ वा नोपयुक्तौषधस्तथा।<br>द्विजदेवगुरूणां च व्यवायी नाश्रमे भवेत्॥ १२१गौ-छाग आदि अन्य योनियोंसे, अयोनियोंसे, औषध-प्रयोगसे अथवा ब्राह्मण, देवता और गुरुके आश्रमोंमें कभी मैथुन न करे॥ १२१॥
चैत्यचत्वरतीर्थेषु नैव गोष्ठे चतुष्पथे।<br>नैव श्मशानोपवने सलिलेषु महीपते॥ १२२हे पृथिवीपते! चैत्यवृक्षके नीचे, आँगनमें, तीर्थमें, पशुशालामें, चौराहेपर, श्मशानमें, उपवनमें अथवा जलमें भी मैथुन करना उचित नहीं है॥ १२२॥
प्रोक्तपर्वस्वशेषेषु नैव भूपाल सन्ध्ययोः।<br>गच्छेद्व्यवायं मतिमान्न मूत्रोच्चारपीडितः॥ १२३हे राजन्! पूर्वोक्त समस्त पर्वदिनोंमें प्रातःकाल और सायंकालमें तथा मल-मूत्रके वेगके समय बुद्धिमान् पुरुष मैथुनमें प्रवृत्त न हो॥ १२३॥
पर्वस्वभिगमोऽधन्यो दिवा पापप्रदो नृप।<br>भुवि रोगावहो नृणामप्रशस्तो जलाशये॥ १२४हे नृप! पर्वदिनोंमें स्त्रीगमन करनेसे धनकी हानि होती है; दिनमें करनेसे पाप होता है, पृथिवीपर करनेसे रोग होते हैं और जलाशयमें स्त्रीप्रसंग करनेसे अमंगल होता है॥ १२४॥
परदारान्न गच्छेच्च मनसापि कथञ्चन।<br>किमु वाचास्थिबन्धोऽपि नास्ति तेषु व्यवायिनाम्॥ १२५परस्त्रीसे तो वाणीसे क्या, मनसे भी प्रसंग न करे, क्योंकि उनसे मैथुन करनेवालोंको अस्थि-बन्धन भी नहीं होता [अर्थात् उन्हें अस्थिशून्य कीटादि होना पड़ता है]॥ १२५॥

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