भारतकोश
विष्णु पुराण

विष्णु पुराण

Vishnu Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

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पृष्ठ 218

अ० १२ ] * तृतीय अंश * २०७


न श्मश्रु भक्षयेल्लोष्टं न मृद्नीयाद्विचक्षणः।<br/>ज्योतींष्यमेध्यशस्तानि नाभिवीक्षेत च प्रभो॥ ११<br/>नग्नां परस्त्रियं चैव सूर्यं चास्तमयोदये।<br/>न हुंकुर्याच्छवं गन्धं शवगन्धो हि सोमजः॥ १२<br/>चतुष्पथं चैत्यतरुं श्मशानोपवनानि च।<br/>दुष्टस्त्रीसन्निकर्षं च वर्जयेन्निशि सर्वदा॥ १३<br/>पूज्यदेवद्विजज्योतिश्छायां नातिक्रमेद् बुधः।<br/>नैकश्शून्याटवीं गच्छेत्तथा शून्यगृहे वसेत्॥ १४<br/>केशास्थिकण्टकामेध्यबलिभस्मतुषांस्तथा।<br/>स्नानार्द्रधरणीं चैव दूरतः परिवर्जयेत्॥ १५<br/>नानार्यानाश्रयेत्कांश्चिन्न जिह्मां रोचयेद् बुधः।<br/>उपसर्पेन्न वै व्यालं चिरं तिष्ठेन्न वोत्थितः॥ १६<br/>अतीव जागरस्वप्ने तद्वत्स्नानासने बुधः।<br/>न सेवेत तथा शय्यां व्यायामं च नरेश्वर॥ १७<br/>दंष्ट्रिणः शृंगिणश्चैव प्राज्ञो दूरेण वर्जयेत्।<br/>अवश्यायं च राजेन्द्र पुरोवातातपौ तथा॥ १८<br/>न स्नायान्न स्वपेन्नग्नो न चैवोपस्पृशेद् बुधः।<br/>मुक्तकेशश्च नाचामेद्देवाद्यर्चां च वर्जयेत्॥ १९<br/>होमदेवार्चनाद्यासु क्रियास्वाचमने तथा।<br/>नैकवस्त्रः प्रवर्तेत द्विजवाचनिके जपे॥ २०<br/>नासमञ्जसशीलैस्तु सहासीत कथञ्चन।<br/>सदृवृत्तसन्निकर्षो हि क्षणादर्द्धमपि शस्यते॥ २१<br/>विरोधं नोत्तमैर्गच्छेन्नाधमैश्च सदा बुधः।<br/>विवाहश्च विवादश्च तुल्यशीलैर्नृपेष्यते॥ २२<br/>नारभेत कलिं प्राज्ञश्शुष्कवैरं च वर्जयेत्।<br/>अप्यल्पहानिस्सोढव्या वैरेणार्थागमं त्यजेत्॥ २३<br/>स्नातो नांगानि सम्मार्जैत्स्नानशाट्या न पाणिना।<br/>न च निर्धूनयेत्केशान्नाचामेच्चैव चोत्थितः॥ २४<br/>पादेन नाक्रमेत्पादं न पूज्याभिमुखं नयेत्।<br/>नोच्चासनं गुरोरग्रे भजेताविनयान्वितः॥ २५<br/>अपसव्यं न गच्छेच्च देवागारचतुष्पथान्।<br/>मांगल्यपूज्यांश्च तथा विपरीतान्न दक्षिणम्॥ २६हे प्रभो! विचक्षण पुरुष मूँछ-दाढ़ीके बालोंको न चबावे, दो ढेलोंको परस्पर न रगड़े और अपवित्र एवं निन्दित नक्षत्रोंको न देखे॥ ११॥ नग्न परस्त्रीको और उदय अथवा अस्त होते हुए सूर्यको न देखे तथा शव और शव-गन्धसे घृणा न करे, क्योंकि शव-गन्ध सोमका अंश है॥ १२॥ चौराहा, चैत्यवृक्ष, श्मशान, उपवन और दुष्टा स्त्रीकी समीपता—इन सबका रात्रिके समय सर्वदा त्याग करे॥ १३॥ बुद्धिमान् पुरुष अपने पूजनीय देवता, ब्राह्मण और तेजोमय पदार्थोंकी छायाको कभी न लाँघे तथा शून्य वनखण्डी और शून्य घरमें कभी अकेला न रहे॥ १४॥ केश, अस्थि, कण्टक, अपवित्र वस्तु, बलि, भस्म, तुष तथा स्नानके कारण भीगी हुई पृथिवीका दूरहीसे त्याग करे॥ १५॥ प्राज्ञ पुरुषको चाहिये कि अनार्य व्यक्तिका संग न करे, कुटिल पुरुषमें आसक्त न हो, सर्पके पास न जाय और जग पड़नेपर अधिक देरतक लेटा न रहे॥ १६॥ हे नरेश्वर! बुद्धिमान् पुरुष जागने, सोने, स्नान करने, बैठने, शय्यासेवन करने और व्यायाम करनेमें अधिक समय न लगावे॥ १७॥ हे राजेन्द्र! प्राज्ञ पुरुष दाँत और सींगवाले पशुओंको, ओसको तथा सामनेकी वायु और धूपका सर्वदा परित्याग करे॥ १८॥ नग्न होकर स्नान, शयन और आचमन न करे तथा केश खोलकर आचमन और देव-पूजन न करे॥ १९॥ होम तथा देवार्चन आदि क्रियाओंमें, आचमनमें, पुण्याहवाचनमें और जपमें एक वस्त्र धारण करके प्रवृत्त न हो॥ २०॥ संशयशील व्यक्तियोंके साथ कभी न रहे। सदाचारी पुरुषोंका तो आधे क्षणका संग भी अति प्रशंसनीय होता है॥ २१॥ बुद्धिमान् पुरुष उत्तम अथवा अधम व्यक्तियोंसे विरोध न करे। हे राजन्! विवाह और विवाद सदा समान व्यक्तियोंसे ही होना चाहिये॥ २२॥ प्राज्ञ पुरुष कलह न बढ़ावे तथा व्यर्थ वैरका भी त्याग करे। थोड़ी-सी हानि सह ले, किन्तु वैरसे कुछ लाभ होता हो तो उसे भी छोड़ दे॥ २३॥ स्नान करनेके अनन्तर स्नानसे भीगी हुई धोती अथवा हाथोंसे शरीरको न पोंछे तथा खड़े-खड़े केशोंको न झाड़े और आचमन भी न करे॥ २४॥ पैरके ऊपर पैर न रखे, गुरुजनोंके सामने पैर न फैलावे और धृष्टतापूर्वक उनके सामने कभी उच्चासनपर न बैठे॥ २५॥<br/>देवालय, चौराहा, मांगलिक द्रव्य और पूज्य व्यक्ति—इन सबको बायीं ओर रखकर न निकले तथा इनके विपरीत वस्तुओंको दायीं ओर रखकर न जाय॥ २६॥