विष्णु पुराण

विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished558 पृष्ठ
पृष्ठ 27, कुल 558 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 27
| २४ | * श्रीविष्णुपुराण * | [ अ० ५ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| तामप्याशु स तत्याज तनुं सद्यः प्रजापतिः।<br>ज्योत्स्ना समभवत्सापि प्राक्सन्ध्या याऽभिधीयते॥ ३८ | फिर शीघ्र ही प्रजापतिने उस शरीरको भी त्याग दिया, वही ज्योत्स्ना हुआ, जिसे पूर्व-सन्ध्या अर्थात् प्रातःकाल कहते हैं॥ ३८॥ |
| ज्योत्स्नागमे तु बलिनो मनुष्याः पितरस्तथा।<br>मैत्रेय सन्ध्यासमये तस्मादेते भवन्ति वै॥ ३९ | इसीलिये, हे मैत्रेय! प्रातःकाल होनेपर मनुष्य और सायंकालके समय पितर बलवान् होते हैं॥ ३९॥ |
| ज्योत्स्ना रात्र्यहनी सन्ध्या चत्वार्येतानि वै प्रभोः।<br>ब्रह्मणस्तु शरीराणि त्रिगुणोपाश्रयाणि तु॥ ४० | इस प्रकार रात्रि, दिन, प्रातःकाल और सायंकाल ये चारों प्रभु ब्रह्माजीके ही शरीर हैं और तीनों गुणोंके आश्रय हैं॥ ४०॥ |
| रजोमात्रात्मिकामेव ततोऽन्यां जगृहे तनुम्।<br>ततः क्षुद् ब्रह्मणो जाता जज्ञे कामस्तया ततः॥ ४१ | फिर ब्रह्माजीने एक और रजोमात्रात्मक शरीर धारण किया। उसके द्वारा ब्रह्माजीसे क्षुधा उत्पन्न हुई और क्षुधासे कामकी उत्पत्ति हुई॥ ४१॥ |
| क्षुत्क्षामानान्धकारेऽथ सोऽसृजद्भगवांस्ततः।<br>विरूपाः श्मश्रुला जातास्तेऽभ्यधावन्तस्तः प्रभुम्॥ ४२ | तब भगवान् प्रजापतिने अन्धकारमें स्थित होकर क्षुधाग्रस्त सृष्टिकी रचना की। उसमें बड़े कुरूप और दाढ़ी-मूँछवाले व्यक्ति उत्पन्न हुए। वे स्वयं ब्रह्माजीकी ओर ही [उन्हें भक्षण करनेके लिये] दौड़े॥ ४२॥ |
| मैवं भो रक्ष्यतामेष यैरुक्तं राक्षसास्तु ते।<br>ऊचुः खादाम इत्यन्ये ये ते यक्षास्तु जक्षणात्॥ ४३ | उनमेंसे जिन्होंने यह कहा कि 'ऐसा मत करो, इनकी रक्षा करो' वे 'राक्षस' कहलाये और जिन्होंने कहा 'हम खायेंगे' वे खानेकी वासनावाले होनेसे 'यक्ष' कहे गये॥ ४३॥ |
| अप्रियेण तु तान्दृष्ट्वा केशाः शीर्यन्त वेधसः।<br>हीनाश्च शिरसो भूयः समारोहन्त तच्छिरः॥ ४४<br>सर्पणात्तेऽभवन् सर्पा हीनत्वादहयः स्मृताः।<br>ततः क्रुद्धो जगत्स्रष्टा क्रोधात्मानो विनिर्ममे।<br>वर्णेन कपिशेनोग्रभूतास्ते पिशिताशनाः॥ ४५ | उनकी इस अनिष्ट प्रवृत्तिको देखकर ब्रह्माजीके केश सिरसे गिर गये और फिर पुनः उनके मस्तकपर आरूढ़ हुए। इस प्रकार ऊपर चढ़नेके कारण वे 'सर्प' कहलाये और नीचे गिरनेके कारण 'अहि' कहे गये। तदनन्तर जगत्-रचयिता ब्रह्माजीने क्रोधित होकर क्रोधयुक्त प्राणियोंकी रचना की; वे कपिश (कालापन लिये हुए पीले) वर्णके, अति उग्र स्वभाववाले तथा मांसाहारी हुए॥ ४४-४५॥ |
| गायतोऽङ्गात्समुत्पन्ना गन्धर्वास्तस्य तत्क्षणात्।<br>पिबन्तो जज्ञिरे वाचं गन्धर्वास्तेन ते द्विज॥ ४६ | फिर गान करते समय उनके शरीरसे तुरन्त ही गन्धर्व उत्पन्न हुए। हे द्विज! वे वाणीका उच्चारण करते अर्थात् बोलते हुए उत्पन्न हुए थे, इसलिये 'गन्धर्व' कहलाये॥ ४६॥ |
| एतानि सृष्ट्वा भगवान्ब्रह्मा तच्छक्तिचोदितः।<br>ततः स्वच्छन्दतोऽन्यानि वयांसि वयसोऽसृजत्॥ ४७ | इन सबकी रचना करके भगवान् ब्रह्माजीने पक्षियोंको, उनके पूर्व-कर्मोंसे प्रेरित होकर स्वच्छन्दतापूर्वक अपनी आयुसे रचा॥ ४७॥ |
| अवयो वक्षसश्चक्रे मुखतोऽजाः स सृष्टवान्।<br>सृष्टवानुदराद्गाश्च पार्श्वाभ्यां च प्रजापतिः॥ ४८<br>पद्भ्यां चाश्वान्समातङ्गान्रासभानगवान्मृगान्।<br>उष्ट्रानश्वतरांश्चैव न्यङ्कूंननयाश्च जातयः॥ ४९ | तदनन्तर अपने वक्षःस्थलसे भेड़, मुखसे बकरी, उदर और पार्श्वभागसे गौ, पैरोंसे घोड़े, हाथी, गधे, वनगाय, मृग, ऊँट, खच्चर और न्यंकु आदि पशुओंकी रचना की॥ ४८-४९॥ |
| ओषध्यः फलमूलिन्यो रोमभ्यस्तस्य जज्ञिरे।<br>त्रेतायुगमुखे ब्रह्मा कल्पस्यादौ द्विजोत्तम।<br>सृष्ट्वा पश्वोषधीः सम्यग्युयोज स तदाध्वरे॥ ५० | उनके रोमोंसे फल-मूलरूप ओषधियाँ उत्पन्न हुईं। हे द्विजोत्तम! कल्पके आरम्भमें ही ब्रह्माजीने पशु और ओषधि आदिकी रचना करके फिर त्रेतायुगके आरम्भमें उन्हें यज्ञादि कर्मोंमें सम्मिलित किया॥ ५०॥ |
| गौरजः पुरुषो मेषश्चाश्वाश्वतरगर्दभाः।<br>एतान्ग्राम्यान्पशूनाहुरारण्यांश्च निबोध मे॥ ५१ | गौ, बकरी, पुरुष, भेड़, घोड़े, खच्चर और गधे ये सब गाँवोंमें |