विष्णु पुराण

विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished558 पृष्ठ
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अ० १६—१८ ] * चतुर्थ अंश * २१३
सोलहवाँ अध्याय
तुर्वसुके वंशका वर्णन
| श्रीपराशर उवाच | श्रीपराशरजी बोले— |
|---|---|
| इत्येष समासस्तस्ते यदोर्वंशः कथितः॥ १॥ अथ तुर्वसोर्वंशमवधारय॥ २॥ तुर्वसोर्वह्निरात्मजः, वह्नेर्भागो भार्गाद्भानुस्ततश्च त्रयीसानुस्तस्माच्च करन्दमस्तस्यापि मरुत्तः॥ ३॥ सोऽनपत्योऽभवत्॥ ४॥ ततश्च पौरवं दुष्यन्तं पुत्रमकल्पयत्॥ ५॥ एवं ययातिशापात्तद्वंशः पौरवमेव वंशं समाश्रितवान्॥ ६॥ | इस प्रकार मैंने तुमसे संक्षेपसे यदुके वंशका वर्णन किया॥ १॥ अब तुर्वसुके वंशका वर्णन सुनो॥ २॥ तुर्वसुका पुत्र वह्नि था, वह्निका भार्ग, भार्गका भानु, भानुका त्रयीसानु, त्रयीसानुका करन्दम और करन्दमका पुत्र मरुत्त था॥ ३॥ मरुत्त निस्सन्तान था॥ ४॥ इसलिये उसने पुरुवंशीय दुष्यन्तको पुत्ररूपसे स्वीकार कर लिया॥ ५॥ इस प्रकार ययातिके शापसे तुर्वसुके वंशने पुरुवंशका ही आश्रय लिया॥ ६॥ |
इति श्रीविष्णुपुराणे चतुर्थेऽंशे षोडशोऽध्यायः॥ १६॥
सत्रहवाँ अध्याय
द्रुह्युवंश
| श्रीपराशर उवाच | श्रीपराशरजी बोले— |
|---|---|
| द्रुह्योस्तु तनयो बभ्रुः॥ १॥ बभ्रोस्सेतुः॥ २॥ सेतुपुत्र आरब्धनामा॥ ३॥ आरब्धस्यात्मजो गान्धारो गान्धारस्य धर्मो धर्माद् घृतः घृताद् दुर्दमस्ततः प्रचेताः॥ ४॥ प्रचेतसः पुत्रश्शतधर्मा बहुलानां म्लेच्छानामुदीच्यानामाधिपत्यमकरोत्॥ ५॥ | द्रुह्युका पुत्र बभ्रु था, बभ्रुका सेतु, सेतुका आरब्ध, आरब्धका गान्धार, गान्धारका धर्म, धर्मका घृत, घृतका दुर्दम, दुर्दमका प्रचेता तथा प्रचेताका पुत्र शतधर्म था। इसने उत्तरवर्ती बहुत-से म्लेच्छोंका आधिपत्य किया॥ १—५॥ |
इति श्रीविष्णुपुराणे चतुर्थेऽंशे सप्तदशोऽध्यायः॥ १७॥
अठारहवाँ अध्याय
अनुवंश
| श्रीपराशर उवाच | श्रीपराशरजी बोले— |
|---|---|
| ययातेश्चतुर्थपुत्रस्यानोस्सभानलचक्षुःपरमेषुसंज्ञास्त्रयः पुत्राः बभूवुः॥ १॥ सभानलपुत्रः कालानलः॥ २॥ कालानलात्सृञ्जयः॥ ३॥ सृञ्जयात्पुरञ्जयः॥ ४॥ पुरञ्जयाज्जनमेजयः॥ ५॥ | ययातिके चौथे पुत्र अनुके सभानल, चक्षु और परमेषु नामक तीन पुत्र थे। सभानलका पुत्र कालानल हुआ तथा कालानलके सृंजय, सृंजयके पुरंजय, पुरंजयके जनमेजय, |