भारतकोश
विष्णु पुराण

विष्णु पुराण

Vishnu Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 317, कुल 558 में से

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पृष्ठ 317

३०६ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० २४


मूल संस्कृतहिन्दी अनुवाद
तेषामपत्यं विन्ध्यशक्तिस्ततः पुरञ्जयस्तस्माद्-<br>रामचन्द्रस्तस्माद्धर्मवर्मा ततो वङ्गस्ततोऽभूनन्दन-<br>स्ततस्सुनन्दी तद्भ्राता नन्द्यशाश्शुक्रः प्रवीर एते<br>वर्षशतं षड्वर्षाणि भूपतयो भविष्यन्ति ॥ ५६ ॥उनका वंशधर विन्ध्यशक्ति होगा। विन्ध्यशक्तिका पुत्र पुरंजय होगा। पुरंजयका रामचन्द्र, रामचन्द्रका धर्मवर्मा, धर्मवर्माका वंग, वंगका नन्दन तथा नन्दनका पुत्र सुनन्दी होगा। सुनन्दीके नन्दियशा, शुक्र और प्रवीर ये तीन भाई होंगे। ये सब एक सौ छः वर्ष राज्य करेंगे॥ ५६॥
ततस्तत्पुत्रास्त्रयोदशैते बाह्लिकाश्च त्रयः ॥ ५७ ॥इसके पीछे तेरह इनके वंशके और तीन बाह्लिक राजा होंगे॥ ५७॥
ततः पुष्पमित्राः पटुमित्रास्त्रयोदशैलाश्र्च<br>सप्तान्ध्राः ॥ ५८ ॥उनके बाद तेरह पुष्पमित्र और पटुमित्र आदि तथा सात आन्ध्र माण्डलिक भूपतिगण होंगे॥ ५८॥
ततश्च कोशलायां तु नव चैव<br>भूपतयो भविष्यन्ति ॥ ५९ ॥तथा नौ राजा क्रमशः कोसलदेशमें राज्य करेंगे॥ ५९॥
नैषधास्तु<br>त एव ॥ ६० ॥निषधदेशके स्वामी भी ये ही होंगे॥ ६०॥
मगधायां तु विश्वस्फटिकसंज्ञोऽन्यान्वर्णान्-<br>करिष्यति ॥ ६१ ॥मगधदेशमें विश्वस्फटिक नामक राजा अन्य वर्णोंको प्रवृत्त करेगा॥ ६१॥
कैवर्त्तवटुपुलिन्द-<br>ब्राह्मणान्राज्ये स्थापयिष्यति ॥ ६२ ॥वह कैवर्त, वटु, पुलिन्द और ब्राह्मणोंको राज्यमें नियुक्त करेगा॥ ६२॥
उत्साद्याखिलक्षत्रजातिं नव नागाः पद्मावत्यां नाम<br>पुर्यामनुगङ्गाप्रयागं गयायाञ्च मागधा गुप्ताश्च<br>भोक्ष्यन्ति ॥ ६३ ॥सम्पूर्ण क्षत्रिय-जातिको उच्छिन्न कर पद्मावतीपुरीमें नागगण तथा गंगाके निकटवर्ती प्रयाग और गयामें मागध और गुप्त राजालोग राज्य भोग करेंगे॥ ६३॥
कोशलान्ध्रपुण्ड्रताम्रलिप्त-<br>समुद्रतटपुरीं च देवरक्षितो रक्षिता ॥ ६४ ॥कोसल, आन्ध्र, पुण्ड्र, ताम्रलिप्त और समुद्रतटवर्तिनी पुरीकी देवरक्षित नामक एक राजा रक्षा करेगा॥ ६४॥
कलिङ्गमाहिषमहेन्द्रभौमान् गुहा भोक्ष्यन्ति ॥ ६५ ॥कलिंग, माहिष, महेन्द्र और भौम आदि देशोंको गुह नरेश भोगेंगे॥ ६५॥
नैषधनैमिषककालकोशकाञ्जनपदान्मणि-<br>धान्यकवंशा भोक्ष्यन्ति ॥ ६६ ॥नैषध, नैमिषक और कालकोशक आदि जनपदोंको मणि-धान्यक-वंशीय राजा भोगेंगे॥ ६६॥
त्रैराज्यमुषिक-<br>जनपदान्कनकाह्वयो भोक्ष्यति ॥ ६७ ॥त्रैराज्य और मुषिक देशोंपर कनक नामक राजाका राज्य होगा॥ ६७॥
सौराष्ट्रावन्तिशूद्राभीरान्नर्मदामरुभूविषयांश्च<br>व्रात्यद्विजाभीरशूद्राद्या भोक्ष्यन्ति ॥ ६८ ॥सौराष्ट्र, अवन्ति, शूद्र, आभीर तथा नर्मदा-तटवर्ती मरुभूमिपर व्रात्य द्विज, आभीर और शूद्र आदिका आधिपत्य होगा॥ ६८॥
सिन्धुतटदाविकोर्वीचन्द्रभागाकाश्मीरविषयांश्च<br>व्रात्यम्लेच्छशूद्रादयो भोक्ष्यन्ति ॥ ६९ ॥समुद्रतट, दाविकोर्वी, चन्द्रभागा और काश्मीर आदि देशोंका व्रात्य, म्लेच्छ और शूद्र आदि राजागण भोग करेंगे॥ ६९॥
एते च तुल्यकालास्सर्वे पृथिव्यां भूभुजो<br>भविष्यन्ति ॥ ७० ॥ये सम्पूर्ण राजालोग पृथिवीमें एक ही समयमें होंगे॥ ७०॥
अल्पप्रसादा बृहत्कोपा-<br>स्सर्वकालमनृताधर्मरुचयः स्त्रीबालगोवधकर्त्तारः<br>परस्वादानरुचयोऽल्पसारास्तमिस्रप्राया उदिता-<br>स्तमितप्राया अल्पायुषो महेच्छा ह्यल्पधर्मा<br>लुब्धाश्च भविष्यन्ति ॥ ७१ ॥ये थोड़ी प्रसन्नतावाले, अत्यन्त क्रोधी, सर्वदा अधर्म और मिथ्या भाषणमें रुचि रखनेवाले, स्त्री-बालक और गौओंकी हत्या करनेवाले, पर-धन-हरणमें रुचि रखनेवाले, अल्पशक्ति तमःप्रधान उत्थानके साथ ही पतनशील, अल्पायु, महती कामनावाले, अल्पपुण्य और अत्यन्त लोभी होंगे॥ ७१॥
तैश्च विमिश्रा<br>जनपदास्तच्छीलानुवर्त्तिनो राजाश्रयशुष्मिणो<br>म्लेच्छाश्चार्याश्च विपर्ययेण वर्त्तमानाः प्रजाः<br>क्षपयिष्यन्ति ॥ ७२ ॥ये सम्पूर्ण देशोंको परस्पर मिला देंगे तथा उन राजाओंके आश्रयसे ही बलवान् और उन्हींके स्वभावका अनुकरण करनेवाले म्लेच्छ तथा आर्यविपरीत आचरण करते हुए सारी प्रजाको नष्ट-भ्रष्ट कर देंगे॥ ७२॥