भारतकोश
विष्णु पुराण

विष्णु पुराण

Vishnu Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

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पृष्ठ 326

अ० १ ] * पञ्चम अंश * ३१५


अक्षौहिण्योऽत्र बहुला दिव्यमूर्त्तिधरासुराः।<br>महाबलानां दृप्तानां दैत्येन्द्राणां ममोपरि॥ २६हे दिव्यमूर्त्तिधारी देवगण! इस समय मेरे ऊपर महाबलवान् और गर्वीले दैत्यराजोंकी अनेक अक्षौहिणी सेनाएँ हैं॥ २६॥
तद्भूरिभारपीडार्त्ता न शक्नोम्यमरेश्वराः।<br>विभर्त्तुमात्मानमह्मिति विज्ञापयामि वः॥ २७हे अमरेश्वरो! मैं आपलोगोंको यह बतलाये देती हूँ कि अब मैं उनके अत्यन्त भारसे पीडित होकर अपनेको धारण करनेमें सर्वथा असमर्थ हूँ॥ २७॥
क्रियतां तन्महाभागा मम भारावतारणम्।<br>यथा रसातलं नाहं गच्छेयमतिविह्वला॥ २८अतः हे महाभागगण! आपलोग मेरे भार उतारनेका अब कोई ऐसा उपाय कीजिये जिससे मैं अत्यन्त व्याकुल होकर रसातलको न चली जाऊँ॥ २८॥
इत्याकर्ण्य धरावाक्यमशेषैस्त्रिदशेश्वरैः।<br>भुवो भारावतारार्थं ब्रह्मा प्राह प्रचोदितः॥ २९पृथिवीके इन वाक्योंको सुनकर उसके भार उतारनेके विषयमें समस्त देवताओंकी प्रेरणासे भगवान् ब्रह्माजीने कहना आरम्भ किया॥ २९॥
ब्रह्मोवाचब्रह्माजी बोले—
यथाह वसुधा सर्वं सत्यमेव दिवौकसः।<br>अहं भवो भवन्तश्च सर्वे नारायणत्मकाः॥ ३०हे देवगण! पृथिवीने जो कुछ कहा है वह सर्वथा सत्य ही है, वास्तवमें मैं, शंकर और आप सब लोग नारायणस्वरूप ही हैं॥ ३०॥
विभूतयश्च यास्तस्य तासामेव परस्परम्।<br>आधिक्यं न्यूनता बाध्यबाधकत्वेन वर्तते॥ ३१उनकी जो-जो विभूतियाँ हैं, उनकी परस्पर न्यूनता और अधिकता ही बाध्य तथा बाधकरूपसे रहा करती है॥ ३१॥
तदागच्छत गच्छाम क्षीराब्धेस्तटमुत्तमम्।<br>तत्राराध्य हरिं तस्मै सर्वं विज्ञापयाम वै॥ ३२इसलिये आओ, अब हमलोग क्षीरसागरके पवित्र तटपर चलें, वहाँ श्रीहरिकी आराधना कर यह सम्पूर्ण वृत्तान्त उनसे निवेदन कर दें॥ ३२॥
सर्वथैव जगत्यर्थे स सर्वात्मा जगन्मयः।<br>सत्त्वांशेनावतीर्योर्व्यां धर्मस्य कुरुते स्थितिम्॥ ३३वे विश्वरूप सर्वात्मा सर्वथा संसारके हितके लिये ही अपने शुद्ध सत्त्वांशसे अवतीर्ण होकर पृथिवीमें धर्मकी स्थापना करते हैं॥ ३३॥
श्रीपराशर उवाचश्रीपराशरजी बोले—
इत्युक्त्वा प्रययौ तत्र सह देवैः पितामहः।<br>समाहितमनाश्चैवं तुष्टाव गरुडध्वजम्॥ ३४ऐसा कहकर देवताओंके सहित पितामह ब्रह्माजी वहाँ गये और एकाग्रचित्तसे श्रीगरुडध्वज भगवान्‌की इस प्रकार स्तुति करने लगे॥ ३४॥
ब्रह्मोवाचब्रह्माजी बोले—
द्वे विद्ये त्वमनाम्नाय परा चैवापरा तथा।<br>त एव भवतो रूपे मूर्त्तामूर्त्तात्मिके प्रभो॥ ३५हे वेदवाणीके अगोचर प्रभो! परा और अपरा—ये दोनों विद्याएँ आप ही हैं। हे नाथ! वे दोनों आपहीके मूर्त्त और अमूर्त्त रूप हैं॥ ३५॥
द्वे ब्रह्मणी त्वणीयोऽतिस्थूलात्मन्सर्व सर्ववित्।<br>शब्दब्रह्म परं चैव ब्रह्म ब्रह्ममयस्य यत्॥ ३६हे अत्यन्त सूक्ष्म! हे विराट्स्वरूप! हे सर्व! हे सर्वज्ञ! शब्दब्रह्म और परब्रह्म—ये दोनों आप ब्रह्ममयके ही रूप हैं॥ ३६॥
ऋग्वेदस्त्वं यजुर्वेदस्सामवेदस्त्वथर्वणः।<br>शिक्षा कल्पो निरुक्तं च च्छन्दो ज्योतिषमेव च॥ ३७आप ही ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद हैं तथा आप ही शिक्षा, कल्प, निरुक्त, छन्द और ज्योतिष-शास्त्र हैं॥ ३७॥
इतिहासपुराणे च तथा व्याकरणं प्रभो।<br>मीमांसा न्यायशास्त्रं च धर्मशास्त्राण्यधोक्षज॥ ३८हे प्रभो! हे अधोक्षज! इतिहास, पुराण, व्याकरण, मीमांसा, न्याय और धर्मशास्त्र—ये सब भी आप ही हैं॥ ३८॥
आत्मात्मदेहगुणवद्विचाराचारि यद्वचः।<br>तदप्याद्यपते नान्यदध्यात्मात्मस्वरूपवत्॥ ३९हे आद्यपते! जीवात्मा, परमात्मा, स्थूल-सूक्ष्म-देह तथा उनका कारण अव्यक्त—इन सबके विचारसे युक्त जो अन्तर्रात्मा और परमात्माके स्वरूपका बोधक [तत्त्वमसि] वाक्य है, वह भी आपसे भिन्न नहीं है॥ ३९॥

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