विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 457, कुल 558 में से
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- श्रीविष्णुपुराण *
[ अ० ५ ]
करम्भबालुकावह्निग्रन्थशस्त्रादिभीषणे । प्रत्येकं नरके याश्च यातना द्विज दुःसहाः ॥ ४५ क्रकचैः पाट्यमानानां मूषायां चापि दहताम्* । कुठारैः कृत्यमानानां भूमौ चापि निखन्यताम् ॥ ४६ शूलैर्बाराण्यमाणानां व्याघ्रवक्त्रे प्रवेश्यताम् । गुधैस्सम्भक्ष्यमाणानां द्वीपिभिश्चोपभुज्यताम् ॥ ४७ क्वाथ्यतां तैलमध्ये च किलघतां क्षारकर्दमे । उच्चान्निपात्यमानानां क्षिप्यतां क्षेपयन्त्रकैः ॥ ४८ नरके यानि दुःखानि पापहेतूद्भवानि वै । प्राप्यन्ते नारकैर्विप्र तेषां संख्या न विद्यते ॥ ४९ न केवलं द्विजश्रेष्ठ नरके दुःखपद्धतिः । स्वर्गैऽपि पातभीतस्य क्षयिणोर्नास्ति निर्वृत्तिः ॥ ५० पुनश्च गर्भं भवति जायते च पुनः पुनः । गर्भं विलीयते भूयो जायमानोऽस्तमेति वै ॥ ५१ जातमात्रश्च प्रियते बालभावेऽथ यौवने । मध्यमं वा वयः प्राप्य बार्द्धके वाथ वा मृतिः ॥ ५२ यावज्जीवति तावच्च दुःखैर्नानाविधैः प्लुतः । तन्तुकारणपक्षमौधैरास्ते कार्पासबीजवत् ॥ ५३ द्रव्यनाशे तथोत्पत्तौ पालने च सदा नृणाम् । भवन्त्यनेकदुःखानि तथैवेष्टविपत्तिषु ॥ ५४ यद्यत्प्रीतिकरं पुंसां वस्तु मैत्रेय जायते । तदेव दुःखवृक्षस्य बीजत्वमुपगच्छति ॥ ५५ कलत्रपुत्रमित्रार्थगृहक्षेत्रधनादिकैः । क्रियते न तथा भूरि सुखं पुंसां यथाऽसुखम् ॥ ५६ इति संसारदुःखार्कतापतापितचेतसाम् । विमुक्तिपादपच्छायामृते कुत्र सुखं नृणाम् ॥ ५७ तदस्य त्रिविधस्यापि दुःखजातस्य वै मम । गर्भजन्मजराद्येषु स्थानेषु प्रभविष्यतः ॥ ५८ निरस्तातिशयाह्लादसुखभावेकलक्षणा । भेषजं भगवत्प्राप्तिरेकान्तात्यन्तिकौ मता ॥ ५९ तस्मात्तत्प्राप्तये यलः कर्तव्यः पण्डितैर्नैरैः । तत्प्राप्तिहेतुर्ज्ञानं च कर्म चोक्तं महामुने ॥ ६०
हे द्विज! फिर तप्त बालुका, अग्नि-यन्त्र और शस्त्रादिसे महाभयंकर नरकोंमें जो यातनाएँ भोगनी पड़ती हैं वे अत्यन्त असह्य होती हैं ॥ ४५ ॥ आरसे चौर जाने, मूसमें तपाये जाने, कुल्हाड़ीसे काटे जाने, भूमिमें गाड़े जाने, शूलपर चढ़ाये जाने, सिंहके मुखमें डाले जाने, गिद्धोंके नोचने, हाथियोंसे दलित होने, तैलमें पकाये जाने, खारे दलदलमें फँसने, ऊपर ले जाकर नीचे गिराये जाने और क्षेपण-यन्त्रद्वारा दूर फेंके जानेसे नरकनिवासियोंको अपने पाप-कर्मके कारण जो-जो कष्ट उठाने पड़ते हैं उनकी गणना नहीं हो सकती ॥ ४६—४९ ॥
हे द्विजश्रेष्ठ! केवल नरकमें ही दुःख हों, सो बात नहीं है, स्वर्गमें भी पतनका भय लगे रहनेसे कभी शान्ति नहीं मिलती ॥ ५० ॥ [नरक अथवा स्वर्ग-भोगके अनन्तर] बार-बार वह गर्भमें आता है और जन्म ग्रहण करता है तथा फिर कभी गर्भमें ही नष्ट हो जाता है और कभी जन्म लेते ही मर जाता है ॥ ५१ ॥ जो उत्पन्न हुआ है वह जन्मते ही, बाल्यावस्थामें, युवावस्थामें, मध्यमवयममें अथवा जराग्रस्त होनेपर अवश्य मर जाता है ॥ ५२ ॥ जबतक जीता है तबतक नाना प्रकारके कष्टोंसे घिरा रहता है, जिस तरह कि कपासका बीज तन्तुओंके कारण सूत्रोंसे घिरा रहता है ॥ ५३ ॥ द्रव्यके उपार्जन, रक्षण और नाशमें तथा इष्ट-मित्रोंके विपत्तिग्रस्त होनेपर भी मनुष्योंको अनेकों दुःख उठाने पड़ते हैं ॥ ५४ ॥
हे मैत्रेय! मनुष्योंको जो-जो वस्तुएँ प्रिय हैं, वे सभी दुःखरूपी वृक्षका बीज हो जाती हैं ॥ ५५ ॥ स्त्री, पुत्र, मित्र, अर्थ, गृह, क्षेत्र और धन आदिसे पुरुषोंको जैसा दुःख होता है वैसा सुख नहीं होता ॥ ५६ ॥ इस प्रकार सांसारिक दुःखरूप सूर्यके तापसे जिनका अन्तःकरण तप्त हो रहा है उन पुरुषोंको मोक्षरूपी वृक्षकी [घनी] छायाको छोड़कर और कहाँ सुख मिल सकता है? ॥ ५७ ॥ अतः मेरे मतमें गर्भ, जन्म और जरा आदि स्थानोंमें प्रकट होनेवाले आध्यात्मिकादि त्रिविध दुःख-समूहकी एकमात्र सनातन औषधि भगवत्प्राप्ति ही है जिसका निरतिशय आनन्दरूप सुखकी प्राप्ति कराना ही प्रधान लक्षण है ॥ ५८-५९ ॥ इसलिये पण्डितजनोंको भगवत्प्राप्तिका प्रयत्न करना चाहिये। हे महामुने! कर्म और ज्ञान—ये दो ही उसकी प्राप्तिके कारण कहे गये हैं ॥ ६० ॥
*दहतामित्यादिषु परस्मैपदमार्पम्।
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