विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 471, कुल 558 में से
संदर्भ में पढ़ें४६० * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० ८
केशिध्वजो विमुक्त्यर्थं स्वकर्मक्षपणोन्मुखः। बुभुजे विषयान्कर्म चक्रे चानभिसंहितम्॥ १०५
किन्तु केशिध्वज विदेहमुक्तिके लिये अपने कर्मोंको क्षय करते हुए समस्त विषय भोगते रहे। उन्होंने फलकी इच्छा न करके अनेकों शुभ-कर्म किये॥ १०५॥
सकल्याणोपभोगैश्च क्षीणपापोऽमलस्तथा। अवाप सिद्धिमत्यन्तां तापक्षयफलां द्विज॥ १०६
हे द्विज! इस प्रकार अनेकों कल्याणप्रद भोगोंको भोगते हुए उन्होंने पाप और मल (प्रारब्ध-कर्म) का क्षय हो जानेपर तापत्रयको दूर करनेवाली आत्यन्तिक सिद्धि प्राप्त कर ली॥ १०६॥
इति श्रीविष्णुपुराणे षष्ठेऽंशे सप्तमोऽध्यायः॥ ७॥
आठवाँ अध्याय
शिष्यपरम्परा, माहात्म्य और उपसंहार
श्रीपराशर उवाच
इत्येष कथितः सम्यक्तृतीयः प्रतिसञ्चरः।
आत्यन्तिको विमुक्तिर्या लयो ब्रह्मणि शाश्वते॥ १
सर्गश्च प्रतिसर्गश्च वंशमन्वन्तराणि च।
वंशानुचरितं चैव भवतो गदितं मया॥ २
पुराणं वैष्णवं चैतत्सर्वकिल्बिषनाशनम्।
विशिष्टं सर्वशास्त्रेभ्यः पुरुषार्थोपपादकम्॥ ३
तुभ्यं यथावन्मैत्रेय प्रोक्तं शुश्रूषवेऽव्ययम्।
यदन्यदपि वक्तव्यं तत्पृच्छाद्य वदामि ते॥ ४
**श्रीपराशरजी बोले—**हे मैत्रेय! इस प्रकार मैंने तुमसे तीसरे आत्यन्तिक प्रलयका वर्णन किया, जो सनातन ब्रह्ममें लयरूप मोक्ष ही है॥ १॥ मैंने तुमसे संसारकी उत्पत्ति, प्रलय, वंश, मन्वन्तर तथा वंशोंके चरित्रोंका वर्णन किया॥ २॥ हे मैत्रेय! मैंने तुम्हें सुननेके लिये उत्सुक देखकर यह सम्पूर्ण शास्त्रोंमें श्रेष्ठ सर्वपापनाशक और पुरुषार्थका प्रतिपादक वैष्णवपुराण सुना दिया। अब तुम्हें जो और कुछ पूछना हो पूछो। मैं उसका तुमसे वर्णन करूँगा॥ ३-४॥
श्रीमैत्रेय उवाच
भगवन्कथितं सर्वं यत्पृष्टोऽसि मया मुने।
श्रुतं चैतन्मया भक्त्या नान्यत्प्रष्टव्यमस्ति मे॥ ५
विच्छिन्नाःसर्वसन्देहा वैमल्यं मनसः कृतम्।
त्वत्प्रसादान्मया ज्ञाता उत्पत्तिस्थितिसंक्षयाः॥ ६
ज्ञातश्चतुर्विधो राशिः शक्तिश्च त्रिविधा गुरो।
विज्ञाता सा च कार्त्स्न्येन त्रिविधा भावभावना॥ ७
त्वत्प्रसादान्मया ज्ञातं ज्ञेयमन्यैरलं द्विज।
यदेतदखिलं विष्णोर्जगन्न व्यतिरिच्यते॥ ८
**श्रीमैत्रेयजी बोले—**भगवन्! मैंने आपसे जो कुछ पूछा था वह सभी आप कह चुके और मैंने भी उसे श्रद्धाभक्तिपूर्वक सुना, अब मुझे और कुछ भी पूछना नहीं है॥ ५॥ हे मुने! आपकी कृपासे मेरे समस्त सन्देह निवृत्त हो गये और मेरा चित्त निर्मल हो गया तथा मुझे संसारकी उत्पत्ति, स्थिति और प्रलयका ज्ञान हो गया॥ ६॥ हे गुरो! मैं चार प्रकारकी राशि¹ और तीन प्रकारकी शक्तियाँ² जान गया तथा मुझे त्रिविध भाव-भावनाओंका³ भी सम्यक् बोध हो गया॥ ७॥ हे द्विज! आपकी कृपासे मैं, जो जानना चाहिये वह भली प्रकार जान गया कि यह सम्पूर्ण जगत् श्रीविष्णुभगवान्से भिन्न नहीं है, इसलिये अब मुझे अन्य बातोंके जाननेसे कोई लाभ नहीं॥ ८॥
¹ देखिये—प्रथम अंश अध्याय २२ श्लोक २३-३३।
² ,, षष्ठ अंश अध्याय ७ श्लोक ६१-६३।
³ ,, षष्ठ अंश अध्याय ७ श्लोक ४८-५१।