विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 473, कुल 558 में से
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- श्रीविष्णुपुराण *
[ ३० ८ ]
सप्तर्षिभिस्तथा धिष्ण्यैर्धिष्ण्याधिपतिभिस्तथा। ब्राह्मणाद्यैर्मनुष्यैश्च तथैव पशुभिर्भूगैः ॥ २४ सरीसृपैर्विहङ्गैश्च पलाशाद्यैर्महीरुहैः। वनाग्निसागरसरित्यातालैः सधरादिभिः ॥ २५ शब्दादिभिश्च सहितं ब्रह्माण्डमखिलं द्विज। मेरोरिवाणुर्यस्येतद्यन्मयं च द्विजोत्तम ॥ २६ स सर्वः सर्ववित्सर्वस्वरूपो रूपवर्जितः। भगवान्कीर्तितो विष्णुरत्र पापप्रणाशनः ॥ २७ यदश्वमेधावभूथे स्नातः प्राज्योति वै फलम्। मानवस्तदवाज्योति श्रुतैतन्मुनिसत्तम ॥ २८ प्रयागे पुष्करे चैव कुरुक्षेत्रे तथार्णवे। कृतोपवासः प्राज्योति तदस्य श्रवणान्तरः ॥ २९ यदग्निहोत्रे सुहुते वर्षणाज्योति मानवः। महापुण्यफलं विप्र तदस्य श्रवणात्सकृत ॥ ३० यज्येष्ठशुक्ल द्वादश्यां स्नात्वा वै यमुनाजले। मथुरायां हरिं दृष्ट्वा प्राज्योति पुरुषः फलम् ॥ ३१ तदाज्योत्यखिलं सम्यगध्यायं यः शृणोति वै। पुराणस्यास्य विप्रषं केशवार्पितमानसः ॥ ३२ यमुनासलिलस्नातः पुरुषो मुनिसत्तम। ज्येष्ठामूले सिते पक्षे द्वादश्यां समुपोषितः ॥ ३३ समभ्यर्चाच्युतं सम्यङ् मथुरायां समाहितः। अश्वमेधस्य यज्ञस्य प्राज्योत्यविकलं फलम् ॥ ३४ आलोक्यद्विद्विमाश्रयेषामुन्नीतानां स्ववंशजैः। एतत्किलोचुरन्येषां पितरः सपितामहाः ॥ ३५ कच्चिदस्मक्कुले जातः कालिन्दीसलिलाप्लुतः। अर्चयिष्यति गोविन्दं मथुरायामुपोषितः ॥ ३६ ज्येष्ठामूले सिते पक्षे येनैवं वयमप्युत। परामृद्विद्विमापस्यामस्तारिताः स्वकुलोद्भवैः ॥ ३७ ज्येष्ठामूले सिते पक्षे समभ्यर्च्य जनार्दनम्। धन्यानां कुलजः पिण्डान्यमुनायां प्रदास्यति ॥ ३८ तस्मिन्काले समभ्यर्च्य तत्र कृष्णं समाहितः। दत्त्वा पिण्डं पितृभ्यश्च यमुनासलिलाप्लुतः ॥ ३९
सप्तर्षि, लोक, लोकपालगण, ब्राह्मणादि मनुष्य, पशु, मृग, सरीसृप, विहंग, पलाश आदि वृक्ष, वन, अग्नि, समुद्र, नदी, पाताल तथा पृथिवी आदि और शब्दादि विषयोंके सहित यह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड जिनके आगे सुमेरुके सामने एक रेणुके समान है तथा जो इसके उपादान-कारण हैं उन सर्व सर्वज्ञ सर्वस्वरूप रूपरहित और पापनाशक भगवान् विष्णुका इसमें कीर्तन किया गया है ॥ २२-२७ ॥
हे मुनिसत्तम! अश्वमेध-यज्ञमें अवभूथ (यज्ञान्त) स्नान करनेसे जो फल मिलता है वही फल मनुष्य इसको सुनकर प्राप्त कर लेता है ॥ २८ ॥ प्रयाग, पुष्कर, कुरुक्षेत्र तथा समुद्रतटपर रहकर उपवास करनेसे जो फल मिलता है वही इस पुराणको सुननेसे प्राप्त हो जाता है ॥ २९ ॥ एक वर्षतक नियमानुसार अग्निहोत्र करनेसे मनुष्यको जो महान् पुण्यफल मिलता है वही इसे एक बार सुननेसे हो जाता है ॥ ३० ॥ ज्येष्ठ शुक्ला द्वादशीके दिन मथुरापुरीमें यमुना-स्नान करके कृष्णचन्द्रका दर्शन करनेसे जो फल मिलता है हे विप्रषं! वही भगवान् कृष्णमें चित्त लगाकर इस पुराणके एक अध्यायको सावधानतापूर्वक सुननेसे मिल जाता है ॥ ३१-३२ ॥
हे मुनिश्रेष्ठ! ज्येष्ठ मासके शुक्लपक्षकी द्वादशीको मथुरापुरीमें उपवास करते हुए यमुना-स्नान करके समाहितचित्तसे श्रीअच्युतका भलीप्रकार पूजन करनेसे मनुष्यको अश्वमेध-यज्ञका सम्पूर्ण फल मिलता है ॥ ३३-३४ ॥ कहते हैं अपने वंशजोंद्वारा [यमुनातटपर पिण्डदान करनेसे] उन्नति लाभ किये हुए अन्य पितरोंकी समृद्धि देखकर दूसरे लोगोंके पितृ-पितामहोंने [अपने वंशजोंको लक्ष्य करके] इस प्रकार कहा था— ॥ ३५ ॥ क्या हमारे कुलमें उत्पन्न हुआ कोई पुरुष ज्येष्ठ-मासके शुक्ल पक्षमें [द्वादशी तिथिको] मथुरामें उपवास करते हुए यमुनाजलमें स्नान करके श्रीगोविन्दका पूजन करेगा, जिससे हम भी अपने वंशजोंद्वारा उद्धार पाकर ऐसा परम ऐश्वर्य प्राप्त कर सकेंगे? जो बड़े भाग्यवान् होते हैं उन्हींके वंशधर ज्येष्ठमासीय शुक्लपक्षमें भगवान्का अर्चन करके यमुनामें पितृगणको पिण्डदान करते हैं ॥ ३६-३८ ॥ उस समय यमुनाजलमें स्नान करके सावधानतापूर्वक भलीप्रकार भगवान्का पूजन
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