विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 475, कुल 558 में से
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- श्रीविष्णुपुराण *
[ ३० ८ ]
सर्वं सर्वमयं समस्तजगता- माधारमात्माश्रयम् । ज्ञानज्ञेयमनादिमन्तरहितं सर्वांमराणां हितं स प्राप्नोति न संशयोऽस्त्यविकलं यद्वाजिमेधे फलम् ॥ ५५
यत्रादौ भगवांश्चराचरगुरु- मध्ये तथास्ते च सः ब्रह्मज्ञानमयोऽच्युतोऽखिलजग- म्मध्यान्तसर्गप्रभुः । तत्सर्वं पुरुषः पवित्रममलं शृण्वन्यठन्वाचय- न्न्राजोत्यस्ति न तत्फलं त्रिभुवने- ष्वेकान्तसिद्धिर्हिः ॥ ५६
यस्मिन्मन्त्यस्तमतिर्न याति नरकं स्वर्गोऽपि यच्चिन्तने विघ्नो यत्र निवेशितात्ममनसो ब्राह्मोऽपि लोकोऽल्पकः । मुक्तिं चेत्सि यः स्थितोऽमलधियां पुंसां ददात्यव्ययः किं चित्रं यदधं प्रयाति विलयं तत्राच्युते कीर्तिते ॥ ५७
यज्ञैर्यज्ञविदो यजन्ति सततं यज्ञेश्वरं कर्मिणो यं वै ब्रह्ममयं परावरमयं ध्यायन्ति च ज्ञानिनः । यं सच्चिन्त्य न जायते न म्रियते नो वद्वन्ते हीयते नैवासन्न च सद्भवत्यति ततः किं वा हरेः श्रूयताम् ॥ ५८
कव्यं यः पितुरूपधृग्विधहुतं हव्यं च भुङ्क्ते विभु- दैवत्वे भगवाननादिनिधनः स्वाहास्वधासंज्ञिते ।
जो पुरुष सम्पूर्ण जगत्के आधार, आत्माके अवलम्ब, सर्वस्वरूप, सर्वमय ज्ञान और ज्ञेयरूप आदि-अन्तरहित तथा समस्त देवताओंके हितकारक श्रीविष्णुभगवान्का चित्तमें ध्यान कर इस सम्पूर्ण पुराणको सुनता है उसे निःसन्देह अश्वमेध-यज्ञका समग्र फल प्राप्त होता है ॥ ५५ ॥
जिसके आदि, मध्य और अन्तमें अखिल जगत्की सृष्टि, स्थिति तथा संहारमें समर्थ ब्रह्मज्ञानमय चराचरगुरु भगवान् अच्युतका ही कीर्तन हुआ है उस परम श्रेष्ठ और अमल पुराणको सुनने, पढ़ने और धारण करनेसे जो फल प्राप्त होता है वह सम्पूर्ण त्रिलोकियोंमें और कहीं प्राप्त नहीं हो सकता, क्योंकि एकान्त मुक्तिरूप सिद्धिको देनेवाले भगवान् विष्णु ही इसके प्राप्तव्य फल हैं ॥ ५६ ॥
जिनमें चित्त लगानेवाला कभी नरकमें नहीं जा सकता, जिनके स्मरणमें स्वर्ग भी विघ्नरूप है, जिनमें चित्त लग जानेपर ब्रह्मलोक भी अति तुच्छ प्रतीत होता है तथा जो अव्यय प्रभु निर्मलचित्त पुरुषोंके हृदयमें स्थित होकर उन्हें मोक्ष देते हैं उन्हीं अच्युतका कीर्तन करनेसे यदि पाप विलीन हो जाते हैं तो इसमें आश्चर्य ही क्या है? ॥ ५७ ॥ यज्ञवेत्ता कर्मनिष्ठ लोग यज्ञोद्धार जिनका यज्ञेश्वररूपसे यजन करते हैं, ज्ञानीजन जिनका परावरमय ब्रह्मस्वरूपसे ध्यान करते हैं, जिनका स्मरण करनेसे पुरुष न जन्मता है, न मरता है, न बढ़ता है और न क्षीण हो जाता है तथा जो न सत् (कारण) हैं और न असत् (कार्य) ही हैं उन श्रीहरिके अतिरिक्त और क्या सुना जाय? ॥ ५८ ॥ जो अनादिनिधन भगवान् विभु पितुरूप धारणकर स्वधासंज्ञक कव्यको और देवता होकर अग्निमें विधिपूर्वक हवन किये हुए स्वाहा नामक हव्यको ग्रहण करते हैं तथा जिन समस्त शक्तियोंके आश्रयभूत भगवान्के विषयमें बड़े-बड़े
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