विष्णु पुराण

विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished558 पृष्ठ
पृष्ठ 477, कुल 558 में से
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॥ श्रीहरिः ॥
श्रीविष्णुपुराणान्तर्गतश्लोकानामकारादिक्रमेणानुक्रमः
| श्लोकाः | अंशा० | अध्या० | श्लो० | श्लोकाः | अंशा० | अध्या० | श्लो० |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ० | अंगुष्ठाद्दक्षिणाद्दक्षः | १ | १५ | ८१ | |||
| अकरोत्स्वतनुमन्याम् | १ | ४ | ८ | अंगुलस्याष्टभागोऽपि | ३ | ७ | ४ |
| अकालगर्जितादौ च | ३ | १२ | ३६ | अंगात्सुनीथापत्यम् | १ | १३ | ७ |
| अकिञ्चनमत्सम्बन्धम् | ३ | ११ | ६२ | अचिरादागमिष्यामि | ५ | ३२ | ३० |
| अकृष्टपच्या पृथिवी | १ | १३ | ५० | अचिन्तयच्च कौन्तेयः | ५ | ३८ | २५ |
| अकृत्वा पादयोः शौचम् | १ | २१ | ३७ | अच्छेनागन्धिलेपेन | ३ | ११ | १९ |
| अकृताग्रयणं यच्च | ३ | १६ | ७ | अच्युतोऽपि तद्दिव्यं रत्नम् | ४ | १३ | २७ |
| अक्रूरकृतवर्मप्रमुखाश्च | ४ | १३ | ६७ | अच्युतोऽप्यतिप्रणतातस्तस्मात् | ४ | १३ | ५७ |
| अक्रूरोऽप्युत्तममणिसमुद्भूत० | ४ | १३ | १०८ | अजयद्बलदेवस्तम् | ५ | २८ | १९ |
| अक्रूरोऽपि विनिष्क्रम्य | ५ | १७ | १ | अजमीढद्विजमीढपुरुमीढाः | ४ | १९ | २९ |
| अक्रूरः क्रूरहृदयः | ५ | १८ | ३० | अजमीढात्कण्वः | ४ | १९ | ३० |
| अक्रूरागमनवृत्तान्तम् | ५ | २० | १८ | अजमीढस्यान्यः पुत्रः | ४ | १९ | ३३ |
| अक्षरं तत्परं ब्रह्म | १ | २२ | ५६ | अजमीढस्य नलिनी नाम | ४ | १९ | ५६ |
| अक्षय्यं नान्यदाधारम् | १ | २ | २० | अजमीढस्यान्या ऋक्षनामा | ४ | १९ | ७४ |
| अक्षप्रमाणमुभयोः | २ | ८ | ७ | अजन्मन्मरे विष्णौ | ५ | ३७ | ७५ |
| अक्षीणेषु समस्तेषु | ६ | ७ | ५२ | अजायत च विप्रोऽसौ | २ | १ | ३५ |
| अक्षीणामर्षमृत्युग्र० | ५ | ३४ | ४४ | अजादशरथः | ४ | ४ | ८६ |
| अक्षौहिण्योऽत्र बहुलाः | ५ | १ | २६ | अजानता कृतमिदम् | ५ | ३७ | ७१ |
| अखिलजगत्स्रष्टुर्भगवतः | ४ | ६ | ५ | अजीजनत्पुष्करिण्याम् | १ | १३ | ३ |
| अखिलजनमध्ये सिंहपददर्शन० | ४ | १३ | ३८ | अज्ञानं तामसो भावः | ६ | ५ | २५ |
| अगस्तिरग्निर्वडवानलश्च | ३ | ११ | ९५ | अज्ञानतमसाच्छन्नः | ६ | ५ | २१ |
| अगाधापारमक्षय्यम् | ३ | ३ | २५ | अज्ञातकुलनामानम् | ३ | ११ | ६१ |
| अग्नये कव्यवाहाय | ३ | १५ | २७ | अण्डानां तु सहस्राणाम् | २ | ७ | २७ |
| अग्निराप्याययेद्धातून् | ३ | ११ | ९२ | अणुप्राण्युपपन्नां च | ३ | ११ | १७ |
| अग्निपुत्रः कुमारस्तु | १ | १५ | ११५ | अनुह्लादह्रददत्तः | ४ | १९ | ४५ |
| अग्निबाहुः शुचिः शुक्रः | ३ | २ | ४४ | अनुप्रयाणि धान्यानि | ६ | १ | ५४ |
| अग्निहोत्रे हूयते या | २ | ८ | ५३ | अणोरणीयांसमसत्स्वरूपम् | ५ | १ | ४२ |
| अग्निसुवर्णस्य गुरुः | ५ | १ | १४ | अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि | ३ | १ | ९ |
| अग्नेः शीतेन तोयस्य | १ | १७ | ६४ | अतश्च मान्धातुः | ४ | ३ | १ |
| अग्न्यन्तकादिरूपेण | १ | २२ | २९ | अतश्च पुरुवंशम् | ४ | १८ | ३० |
| अग्रजस्य ते हीयमवनिस्त्वया | ४ | २० | १७ | अतश्चेक्ष्वाकवो भविष्याः | ४ | २२ | १ |
| अग्रन्यस्तविषाणाग्रः | ५ | १४ | ९ | अतिविभूतेः | ४ | १ | २९ |
| अंगमेषा त्रयी विष्णोः | २ | ११ | ११ | अतिचपलचित्ता | ४ | १२ | २६ |
| अंगादनपानस्ततः | ४ | १८ | १५ | अतिदुष्टसंहारिणः | ४ | ४ | १०४ |
| अंगारकोऽपि शुक्रस्य | २ | ७ | ८ | अतितिक्षायनं क्रूरम् | ३ | १७ | २३ |
| अंगानि वेदाश्चत्वारः | ३ | ६ | २८ | अतिथिर्यस्य भग्नाशः | ३ | ११ | ६८ |
| अंगिरसश्च सकाशात् | ४ | ६ | १३ | अतिथिर्यस्य भग्नाशः | ३ | ९ | १५ |